इलाहाबाद में हए ब्लागिंग सेमिनार में एक दिवसीय शिरकत के बाद हम दिल्ली चले गए थे। वहां से आज सुबह ही वापसी हुई। इस बीच नेट से दूर रहा। अब रवि जी के सौजन्य से उपलब्ध करीब ढाई दर्जन लिंक्स को बारी-बारी से देखा। ब्लागिंग नहीं करता, ब्लागर नहीं हूं पर इस विधा और इस मंच का उपयोगकर्ता होने की वजह से इस विधा को समझने का उतना ही भ्रम मुझे भी है जितना यहां मौजूद कई लोगों को है ,जिनमें हिन्दुस्तान के अलावा विदेशों में बसे ब्लागिंग के आधा दर्जन से ज्यादा भीष्म पितामह भी हैं। तमाम बातों को दिलचस्पी से पढ़ा। हिन्दी का नाम जिस भी आयोजन से जुड़ा हो, उसे लेकर आरोप-प्रत्यारोप, बहस-मुबाहसा, वितंडा, मान-मनौवल, लगाई-बुझाई न हो, यह असंभव है। इस बार भी यह होना ही था। बहस के किन्हीं आयामों पर बात करना तभी संभव हो सकता है जब उद्धेश्य किसी नतीजे पर पहुंचना हो। सजा या फतवा सुनाने की हिम्मत किए बगैर बहस के नाम पर सिर्फ अतीतगान और पंडिताई हो, तब उबासी आनी स्वाभाविक है। 
यह चित्र सुबह साढ़े नौ बजे का है। कार्यक्रम शुरु होने के करीब ढाई घंटे पहले। अनूप नजर आ रहे हैं और पीछे दीवार पर कुछ वायरिंग देख रहे हैं रवि जी। ब्रॉडबैंड के जरिये सबको तुरत-फुरत हाल बताने के प्रयासों में ये दोनों व्यस्त रहे। इनकी लगन को नमन् है। हम भी इनके साथ लगे थे, तमाशाई बन कर। आयोजन के आलोचक ज़रा ध्यान दें, ये दोनों आमंत्रित अतिथि थे।
जो उबासी इलाहाबाद में नहीं आई, वह इन तमाम लिंक्स को पढ़ते हुए आई। हैरत है कि एक प्रतिष्ठित संस्था द्वारा आयोजित सेमिनार, सम्मेलन, मीट से...जो चाहें कह लें, भाई लोग संतुष्ट नहीं हैं। इसे व्यक्तिगत सम्मान का मुद्दा मानते हुए ब्लागजगत की अस्मिता से बलात्कार जैसी अश्लील शब्दावली का प्रयोग कर रहे हैं। हिन्दी ब्लागिग के पुरोधा वे हैं। या तो इस पर वे कुछ कर सकते हैं, या माइक्रोसॉफ्ट। इनके बीच कोई और नहीं होना चाहिए। निमंत्रण न मिलने की बात कई लोगों ने कही। यह सरासर ग़लत और गलत तथ्य को सही करार देने जैसी बात है। इंडियन एकेडमी के ब्लाग पर बीते महिने के आखिरी हफ्ते में इस बारे में पोस्ट छपी थी जिसका मक़सद ही सबको न्योता देना था। हमने उसे पढ़कर ही सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी से बात की थी और जाने का मन बनाया था। पर दिल्ली का कार्यक्रम तय होने से बाद में न जाने का फैसला किया था। आयोजन के दस दिन पहले फिर मन बदला क्योंकि कई साथियों के आने की सूचना मिली, सो एक दिन का कार्यक्रम बना डाला। इससे दो महिने पहले भी इस कार्यक्रम की सूचना अनूप जी ने दी थी और आने का आग्रह किया था। तब हमने आने-जाने का आरक्षण करा लिया था। हमें नहीं पता कितने लोगों को निमंत्रण मिला, पर हमने पोस्ट पढ़कर आयोजकों से सम्पर्क किया।
हिन्दिनी पर ई-स्वामी की ताजी पोस्ट पर अनूप शुक्ल की टिप्पणी से दो सौ फीसद सहमत हैं। इस संदर्भ में जिस तरह से नामवरसिंह को बुरा-भला कहा जा रहा है वह बेशर्मी की पराकाष्ठा है। आपने क्या ऐसा कर दिया है हिन्दी के लिए जिसकी वजह से नामवरजी से ज्यादा अवदान आपका माना जाए और उनके लिए इस किस्म की अभिव्यक्ति को सही ठहराया जाए? आप साहित्य के क्षेत्र के बहुत बड़े नाम हैं? आपका कोई सफल प्रकाशन है? आप जो ब्लागिंग का तकनीकी ज्ञान देते हैं, नामवरजी ने कभी उसमें ख़लल डाला है? आप लोग जो यह माने बैठे हैं कि आपकी वजह से हिन्दी ब्लागिंग इस मुकाम तक पहुंची है, कृपया इस मुगालते में न रहें। क्या इसे ही हिन्दी सेवा मान रहे हैं ? आप खुद किसी वक्त मठाधीश थे, अब ब्लागिंग पर बढ़ती हिन्दी देख कर दूसरों को मठाधीश कह रहे हैं। हर एक को किसी मुद्दे पर अपनी राय रखने और उसे बदलने का हक है। आज नामवरजी अगर अपना मत बदल रहे हैं तो उसमें इतना बुरा क्या हो गया? ब्लाग के लिए चिट्ठा शब्द निश्चित ही वर्धा विश्वविद्यालय की देन नहीं है। नामवरजी को इसकी जानकारी नहीं रही होगी। यह कतई महत्वपूर्ण नहीं है कि चिट्ठा शब्द का ब्लाग के लिए सर्वप्रथम प्रयोग करनेवाले का नाम उन्हें पता रहे। यह कोई श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं था। अभी तो इस पर ही हिन्दीवाले एकमत नहीं होंगे कि हर चीज़ के हिन्दीकरण के क्या मायने है? विदेशी प्रतिभा से कोई प्रणाली सामने आ जाए, हम बस इतना कर दें कि उसका हिन्दी नाम रख दें!!! अजीब सिफ़त है हम हिन्दुस्तानियों की!! ब्लाग को ब्लाग ही रहने दो, कोई नाम न दो साथियों.... चिट्ठा शब्द ही ब्लाग का सर्वमान्य पर्याय हो, ऐसा शिवशम्भुजी आकर कह गए थे क्या? सो नामवर जी ने कोई गुनाह नहीं किया है। इसके अलावा उन्होंने या किसी ने भी कोई आपत्तिजनक बात पूरे आयोजन में नहीं कही। हम पूरे अट्ठाइस घंटों के गवाह है।
ब्लाग नाम के चिट्ठारूप की जानकारी तो विभूतिनारायण राय को भी नहीं होगी। हमें अभी तमाम और लोगों को भी इन्हें ब्लाग की विधा से जोड़ना है। यह आयोजन इन्ही की पहल पर हुआ, यह बड़ी बात है। पर कुछ मठाधीश ऐसा नहीं होने देना चाहते। इनके पेट में दर्द होता है जब ये हिन्दी ब्लागरों की बढ़ती संख्या देखते हैं। इन्हें अपना वो छोटा सा कुनबा याद आता है जब अपनी ढपली बजा-बजा कर ये मस्त थे। इनका काम पांच सुरों से ही चल जाता था। सात सुरों की तो बात ही क्या? हिन्दी ब्लागिंग में यह लगातार हो रहा है कि जुमा जुमा पांच, छह साल पहले शुरू हुए संचार-संवाद के इस साधन को चंद तकनीकी जानकारों ने आपसी संवाद का जरिया बनाया। गपशप होने लगी। कुछ लिखते लिखते यह भ्रम भी पाल लिया कि हिन्दी की सेवा हो रही है। अन्य लोग जब इस समूह की गतिविधियों से उत्साहित हुए तब मठाधीशों के अंदाज़ में उनसे पेश आया जाता था। 2005-2006 में मुझे भी यह अनुभव हुआ। अहम्मन्यता का आलम यह था कि ब्लागिंग या अन्य समूहों से जुड़ने की इच्छा रखनेवालों को मठाधीश के अंदाज़ में ज्ञान दिया जाता था और टरकाया तक जाता था। मैं इसका भुक्तभोगी हूं। बाद में जब ब्लागर के आसान तरीके की वजह से 2007 से हिन्दी ब्लागिंग ने तेजी पकड़ी उनमें पत्रकारिता, रंगकर्म और कलाजगत से जुड़े लोग भी थे और सामाजिक कार्यकर्ता भी, तब इनकी धमक से घबराए लोगों ने खुद के लिए पितृपुरुष, भीष्म-पितामह जैसे शब्द गढ़ने शुरु कर दिए। पांच साल की परम्परा के इन भीष्म पितामहों को सोचना चाहिए कि हिन्दी गद्य की शुरुआत कब से हुई, उर्दू (या हिन्दुस्तानी ) का उसमें कितना योगदान था, लल्लूजी लाल कहां टिकते थे। उसके बाद प्रेमचंद हुए। फिर चतुरसेन शास्त्री जैसे लोग भी आए। इनमें से किसी ने भी किसी को भीष्म पितामह नहीं कहा और न ही आलोचकों ने ऐसा कुछ कहा। पर यह उदाहरण करीब डेढ़ सदी का दायरा समेट रहा है जबकि हिन्दी ब्लागिंग एक चुटकुला है। यहां पांच साल में भीष्म पितामह बन रहे हैं और उनकी भूमिका धृतराष्ट्रों जैसी है!!! अपने अलावा कुछ दिखता नहीं है। हर थोड़े समय बाद अतीतगान करते हैं। हमारे वक्त में ऐसा था, वैसा था। राष्ट्रवादी भी थे, , लड़ाके भी थे, सुधारवादी मुसलमान भी थे वगैरह वगैरह। ...ये सब क्या है भाई ? चांद पर पहले पहुंचने से क्या चांद पर हक भी अमेरिका का हो गया? वो तय करेगा कि क्या, कैसे होना चाहिए? एक आयोजन नहीं झेला जा रहा है। खींच खींच कर पोस्ट लिखने के बहाने ढूंढे जा रहे हैं। इससे पहले के जिन आयोजनों की जानकारी सार्वजनिक कर दी गई थी, उनमें स्थानीय ब्लागरों के अलावा कितने स्वनामधन्य ब्लागर चले जाते रहे हैं ? यह सर्टिफिकेट कौन देगा कि इन्द्रसभा का न्योता भी आपको मिल जाए तो उसमें आप कमी नहीं निकालिएगा? हिन्दी ब्लागिंग के पहले दशक में ही भीष्म पितामह से लेकर भस्मासुर तक सब पैदा हो गए? सचमुच पुराण कल्पित कलियुग आया हो या नहीं, पर हिन्दी ब्लागिंग में तो यह यकीनन आ चुका है। एक अच्छे आयोजन की बेबात, घर बैठे इतनी आलोचना सचमुच हिन्दी में ही सम्भव है। हमें खुशी है कि हम एक दिन के लिए ही सही, एक बेहतरीन आयोजन के साक्षी बने। हिन्दुस्तानी एकेडमी, महात्मागांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा को इस आयोजन के लिए बधाई देते हैं। सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी और डॉ संतोष भदौरिया ने समूचे आयोजन को गरिमामय रूप देने में बहुत मेहनत की है। अनूपजी सकारात्मक सोच वाले ब्लागर साथियो से सम्पर्क करने में जुटे रहे। आयोजकों की इच्छा शक्ति का सम्मान रखते हुए, मगर इस विधा में उनकी नई अभिरुचि के मद्देनजर अनूप जी ने व्यस्तता के बावजूद समय निकाला। इलाहाबाद से दूर-पास के जो भी ब्लागर साथी आयोजन में पहुंचे, वे सिर्फ हिन्दी ब्लागिंग पर चर्चा और उससे बढ़ कर ब्लागरों के आपसी मेल-जोल के इस अवसर का लाभ लेने पहुंचे थे। आभासी रिश्तों की जब कभी यथार्थ के धरातल पर आजमाईश का मौका हो, आज के युग में उसे गंवाना नहीं चाहिए। यह अवसर तकनीक और तहजीब की परख का होता है। हम सब जो वहां थे, इसी बात के लिए थे। न हमें भ्रष्टाचार की बू आई, न कोई सड़ांध, न ही किसी वाद का वितंडा। हमें नहीं लगता कि वहां से हम कुछ खोकर लौटे हैं या ठगे गए हैं। हमारी उपलब्धि है कि हम कई दोस्तों से बतियाए। हर्षवर्धन त्रिपाठी, भूपेन, इरफान, मसिजीवी का वक्तारूप बहुत अच्छा लगा। हे मठाधीशों, पितृपुरुषों, भीष्म पितामहों, आप भी आते तो अच्छा लगता। अपना बड़प्पन दिखाते हुए। आपके दो पथभ्रष्ठ साथी यहां थे, पर उन्हें इन विशेषणों से मोह नहीं और न ही वे ऐसा कुछ होने का ढोंग करते हैं। उन्हें पता है पांच साल और पचास साल का फर्क क्या होता है। प्रेमचंद की बड़ै भैया कहानी भी उन्होंने पढ़ी है, शायद आपने नहीं।
रोषपूर्ण टिप्पणियों की प्रतीक्षा में….एक अ-ब्लागर जो1983 से पत्रकारिता कर रहा है और 1989 से ऑनलाईन पत्रकार-कर्म करने का आदी रहा है, फिर भी खुद को तकनीकी निरक्षर ही मानता है। बीते कुछ वर्षों से एमएस वर्ड में लिखने की जगह ब्लागर के एडिट आप्शन में जाकर लिख रहा है। वजह जानने के लिए फोन करें, हिन्दी में समझा दूंगा। मैं भी एक साथ कनपुरिया, मालवी, महाराष्ट्रीय, भोपाली और हरियाणवी हूं साहबान। समझ रहे हैं न!!! ये अति होने के बाद की बातें हैं। देखते हैं, आप कैसी बाते करते हैं। वैसे मुझे अपने देश की संस्कृति और मिट्टी की खूब पहचान है… आप लोग कुछ विदेश में घूम-घाम कर भूल कर रहे हैं। आप मठाधीश हैं, अपन भी खांटी पत्रकार हैं। बताएँ, नामवरसिंह को क्यों इतनी गाली दी जा रही है। हमने क्या गुनाह किया वहां जाकर। आप कौन हैं साहब। बहुत छिपाया नाम, अब तो बताएं? जै जै।
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