Saturday, July 19, 2008

प्रभाकर , तूँ कबो सुधरबS ना ? [बकलमखुद-56]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल1 पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा और हर्षवर्धन त्रिपाठी को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के ग्यारहवें पड़ाव और छप्पनवें सोपान पर मिलते हैं खुद को अलौकिक आत्मा माननेवाले प्रभाकर गोपालपुरिया से। इनका बकलमखुद पेश करते हुए हमें विशेष प्रसन्नता है क्योंकि अब तक अलौकिक स्मृतियों के साथ कोई ब्लागर साथी यहां अवतरित नहीं हुआ है। बहरहाल, प्रभाकर उप्र के देवरिया जिले के गोपालपुर के बाशिंदे हैं । मस्तमौला हैं और आईआईटी मुंबई में भाषाक्षेत्र में विशेष शोधकार्य कर रहे हैं। उनके तीन ब्लाग खास हैं भोजपुर नगरिया, प्रभाकर गोपालपुरिया और चलें गांव की ओर । तो जानते हैं दिलचस्प अंदाज़ में लिखी गोपालपुरिया की अनकही ।

लंठई के कुछ और किस्से...

 

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कुछ पल 

मुंबई आईआईटी के अपने  दोस्तों केसाथ एक सेमिनार में हिस्सेदारी के बीच फुर्सत के लम्हे गोवा में

क और मजेदार घटना सुनाकर अपनी लंठई का इतिश्री कर देता हूँ- बात उन दिनों की है जब मैं एम.ए. की परीक्षा देने के लिए मुम्बई से गाँव गया था। मैंने परीक्षा के लिए नोट्स भी बना लिए थे और घूमते समय भी कभी-कभी उन्हें पढ़ लिया करता था। एकदिन मेरे कुछ दोस्तों ने कहा कि बहुत दिनों के बाद आप आए हैं और आपके जाने के बाद हमलोग भी ठीक से कभी होरहा नहीं खा पाए। मैं बोला ठीक है,चलो आज ही होरहा लगाते हैं और जमकर खाते हैं। दोपहर का समय था और मेरे दादाजी दरवाजे पर ही बैठकर कुछ लोगों के साथ बातचीत कर रहे थे। मैं खिड़की के रास्ते घर से बाहर निकला और पहुँच गया नहर के पास जहाँ हमारे गाँव के ही एक पंडीजी का खेत था। उस खेत में बहुत ही बढ़िया और अनघा मटर था। हमारे दोस्त पहले से ही उस खेत के आस-पास में छिपे थे।

म लोगों ने आव देखा ना ताव और पंडीजी के खेत में ऐसे टूट पड़े जैसे बाभन लोग दही-चिउरा-चिनी पर टूट पड़ते हैं। जल्दी-जल्दी हमलोग एक-एक मोटरी मटर उखाड़कर छिपते-छिपते बहुत दूर भाग गए। इधर क्या हुआ कि जो नोट्स मेरे पैंट के पिछली पाकेट में खोंसे हुए थे वे मटर उखाड़ते समय पंडीजीके खेत में ही गिर गए थे और हड़बड़ी में मैंने ध्यान नहीं दिया था। पंडीजी आधे-एक घंटे के बाद अपने खेत में पहुँचे तो उनको वे नोट्स पड़े मिले। पंडीजी वे नोट्स लेकर मेरे दादाजी के पास आए और बोले के आज मेरे खेत में से मटर उखाड़ा गया है और वहीं ये कागजात मिले। फिर इधर-उधर से काफी छानबीन के बाद मेरे दादाजी को यह पता चला कि वे नोट्स किसके हैं। मैं होरहा-वोरहा खाकर जब घर आया तो दादाजी ने मुझे बुलाया और गुस्से में सिर्फ इतना ही कहा-"तूँ! कबो सुधरबS ना? (तुम कभी नहीं सुधरोगे?)"

मेरा भोलापन, बचपना, बेवकूफी या कुछ और...

मेरी ये अनकही पढ़कर आप लोग मुझे 'बुद्धि का भसूर', 'गोबर गणेश', 'महामूर्ख', 'महाबैल' या 'महागर्दभाधिराज' जैसी उपाधियाँ मत दे दीजिएगा।

मारे यहाँ गाँवों में अगर किसी के सर में कौवा चोंच मार दे तो इसे बहुत ही अशुभ समझा जाता है। लोगों का मानना है कि अगर जिसके सिर में कौवे ने चोंच मार दिया, उसके नाम पर अगर कोई और उसका सगा-संबंधी शोक प्रकट कर दे तो अशुभता खतम हो जाती है। बात उस समय की है जब मैं पाँचवीं में पढ़ रहा था। एक दिन मेरी चाची ने मुझसे कहा,"मेरे सिर में कौवे ने चोंच मार दी है। अस्तु तुम नानी (चाची की माँ) के पास चले जाओ और उससे कह देना कि चाची मर गईं। जब वो रोने लगेगी तो बता देना मरी नहीं हैं, कोवे ने सिर में चोंच मारा है।"मैं नानी के पास जाने के लिए तैयार हो गया। मैं बहुत खुश था कि मुझे साइकिल चलाने को मिलेगी और घूमने का मौका भी।

चाची ने कहा है कि वे मर गई हैं..

स समय मैं लँगड़ी साइकिल अच्छी तरह से चला लेता था। नानी का गाँव भी बहुत पास में ही है। जब मैं नानी के घर पहुँचा तो नानी बाहर ओसारे में ही बैठकर कुछ औरतों से बात कर रही थीं। मुझे देखकर वे बहुत खुश हुईं। मैंने पँवलग्गी की और उनके पास ही बैठ गया। उसके बाद नानी उठकर घर में गईं और खाने-पीने की बहुत सारी चीजें जैसे भुजा-भरी, लाई आदि लाकर मेरे आगे रख दीं।

ब मैं खाने लगा तो नानी ने मुझसे घर का समाचार पूछा। मैंने कहा कि सब ठीक है पर चाची को कोवे ने मार दिया है अस्तु उन्होंने मुझे तुम्हारे पास यह कहने के लिए भेजा है कि चाची मर गईं। अरे यह क्या? मेरे इतना कहते ही नानी और वहाँ बैठीं अन्य महिलाएँ हँसने लगी। उनका हँसना, मुझे मेरी मूर्खता का आभास करा गया। नानी बोली कि कोई बात नहीं। तुम खाओ-पीओ। फिर नानी ने अपनी सास (चाची की दादी) के पास चाची-मरण का झूठा संदेशा भिजवाया और अपने न रोकर अपनी सास को रुलवाया। इस घटना को सुनकर आप लोग मुझे 'बुद्धि का भसूर', 'गोबर गणेश', 'महामूर्ख', 'महाबैल' या 'महागर्दभाधिराज' जैसी उपाधियाँ मत दे दीजिएगा।  

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गुरु के साथ


गोवा के उसी सेमिनार के दौरान अपने गुरु, मार्गदर्शक पुष्पक सर और मित्रों की संगत में कुछ हल्के फुल्के क्षण

                                                                                            अगली कड़ी में समाप्त

[अब तक छप्पन- साथियों ये बकलम की छप्पनवीं कड़ी है। जिन साथियों ने हमारे अनुरोध को कुबूल तो कर लिया है पर अभी तक लिखना शुरू नहीं किया है वे ज़रा समय निकालें :)]

Friday, July 18, 2008

कहनी है कुछ कथा-कहानी

क्सर कहा जाता है कि कथा-कहानियों के दिन गए मगर ये सच नहीं है। ये अलग बात है कि दादी-नानी से अब ये सुनने को नहीं मिलती क्योंकि वे खुद अब टीवी सीरियलों की सास-बहू मार्का कहानियों में गुम हो गई हैं। किस्से -कहानियां तब से इन्सान के इर्दगिर्द हैं जब से उसने बोलना सीखा है। कथा या कहानी दरअसल मनोरंजन के सबसे आदिम उपकरणों में हैं और उनकी उपयोगिता आज भी बनी हुई है।

 

था या कहानी एक ही मूल mosaic9403861से उपजे दो अलग अलग शब्द हैं। मगर इनका भाव एक ही है काल्पनिक वृत्तांत, घटना , उल्लेख, चर्चा करना। कथा शब्द बना है संस्कृत धातु कथ् से । इस धातु से हिन्दी में कई शब्दों की रचना हुई है जिनमें से ज्यादातर का इस्तेमाल बोलचाल में खूब होता है। कथ् का अर्थ है बताना , समाचार देना, वार्तालाप करना, वर्णन करना आदि। हिन्दी में सर्वाधिक व्यवहृत कहा या कहना जैसे शब्द इसी कथ् धातु की देन हैं। गौर करें कि देवनागरी का वर्ण त+ह से मिलकर बना है। कथ् से का लोप होने से कह् बचा रह गया जिससे कह, कहा, कहना जैसी क्रियाएं बनीं। कथ् से बना कथनम् जिससे हिन्दी में कथन शब्द बना। उक्ति , वचन, सूक्ति, आदेश आदि के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग होता है। कथनी और करनी जैसे मुहावरे से यह स्पष्ट है।  इसका देशज रूप कहन भी इन्हीं अर्थो में प्रयोग किया जाता है। इसी तरह कहाना, कहलाना, कहलवाना जैसे रूप भी बने हैं जो बोलचाल में प्रचलित हैं। यूं कथनम् का अर्थ कथा कहना भी है। यहां भी त+ह अर्थात मे से का लोप करें तो कहानी की उत्पत्ति समझ में आ जाएगी।

गौरतलब है कि कथ् , कथा , कहन , कहानी, कथन आदि शब्द भी मूल रूप से वर्ण से ही जुड़ रहे हैं जिसमें प्रकृति की आदिम ध्वनियों अर्थात झरनों की कलकल, कौवे की कांवकांव और कोयल की कुहूक प्रकट होती है। इसी से बने कव् में स्तुति का भाव समाया और कवि, कविता, काव्य जैसे शब्द बने। इसी से कथ् भी बना जिसने कविता के गद्य रूप कथा का सृजन किया। कहनेवाले के लिए कथक रूप बना अर्थात जो कथा कहे। इसने ही नृत्य-संगीत की दो विशिष्ट शैलियों कत्थक और कथकलि के नामकरण में भूमिका निभाई। गौरतलब है कि क्रमशः उत्तर और दक्षिण की इन नृत्यशैलियों में आख्यान अथवा प्रसंग ही प्रमुखangrakhas होते हैं इसीलिए इनके नामकरण में कथा प्रमुख है। इससे बने अन्य शब्दों में कथोपकथन, कथाकार , कथित, कथनी, कहासुनी, कथानक, कथावस्तु, कथावाचन और कथावाचक आदि अनेक शब्द बने हैं।

स संदर्भ में भजन, नाटक और एकांकियों के जरिये किसी ज़माने में देशभर में धूम मचा देने वाले पंडित राधेश्याम कथावाचक का जिक्र किए बिना बात अधूरी रह जाएगी। बरेली में करीब एक सदी से भी ज्यादा पहले जन्में कथावाचक जी ने पारसी और नौटंकी शैली के रंगमंच में खूब अपना हुनर दिखाया । इनके पिता भी कथावाचक थे। बाद में राधेश्यामजी ने अपनी खुद की रामकथा शैली विकसित की। उन्होने राधेश्याम रामायण भी लिखी। उनकी रामकथा के निरालेपन की वजह वह छंद था जिसे लोगों ने राधेश्याम छंद नाम ही दे दिया था।

            टिप्पणी - प्रसाद के लिए आपका शुक्रिया

फर की पिछली कड़ियों – कौवे और कोयल की रिश्तेदारी, रवीश की ब्लागवार्ता में शब्दों का पुरोहित, जड़ से बैर , पत्तों से यारी, योग के 'अर्थ' में मगन, थप्पड़ जड़ने की जटिलता और और यूं जन्मी कविता... पर आप सबने टिप्पणियों का जो प्रसाद भेजा उसे पाकर धन्य हुआ हूं। शुक्रिया आप सबका।

Raviratlami यूनुस रंजना [रंजू भाटिया] अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी राज भाटिय़ा उमेश कुमार अमित पुरोहित शैलेश भारतवासी समरेंद्र sushant jha Mired Mirage sidheshwer सतीश सक्सेना  Manish Kumar siddharth vipinkizindagi डा० अमर कुमार Smart Indian... E-Guru Maya Kalp Kartik Ashok Pande Lavanyam - Antarman श्रद्धा जैन कुश एक खूबसूरत ख्याल Nilotpal PD बलबिन्दर anitakumar mohan महेन नीरज गोस्वामी Arun  सजीव सारथी अभिषेक ओझा मीनाक्षी  Pramod Singh   हर्षवर्धन Sanjeet Tripathi  Dr. Chandra Kumar Jain neelima sukhija arora  परमजीत बाली Udan Tashtari दिनेशराय द्विवेदी  Ghost Buster अरुण DR.ANURAG अभिषेक ओझा  Pratyaksha arvind mishra  सागर नाहर vinitutpal  प्रभाकर पाण्डेय neelima अनूप शुक्ल  pallavi trivedi मीत विष्‍णु बैरागी सतीश पंचम  और शहरोज़ । आप सबको मेरी शुभकामनाएं । सफर में बने रहें।

Wednesday, July 16, 2008

मांटेसरी स्कूल के हत्यार गुरुजी [बकलमखुद - 55]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल1 पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा और हर्षवर्धन त्रिपाठी को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के ग्यारहवें पड़ाव और पचपनवें सोपान पर मिलते हैं खुद को अलौकिक आत्मा माननेवाले प्रभाकर गोपालपुरिया से। इनका बकलमखुद पेश करते हुए हमें विशेष प्रसन्नता है क्योंकि अब तक अलौकिक स्मृतियों के साथ कोई ब्लागर साथी यहां अवतरित नहीं हुआ है। बहरहाल, प्रभाकर उप्र के देवरिया जिले के गोपालपुर के बाशिंदे हैं । मस्तमौला हैं और आईआईटी मुंबई में भाषाक्षेत्र में विशेष शोधकार्य कर रहे हैं। उनके तीन ब्लाग खास हैं भोजपुर नगरिया, प्रभाकर गोपालपुरिया और चलें गांव की ओर । तो जानते हैं दिलचस्प अंदाज़ में लिखी गोपालपुरिया की अनकही ।

 

 बचपन की शैतानियाँ

पढ़ने में बहुत तेज होने का यह मतलब नहीं कि प्रतिदिन स्कूल ही जाया जाए। बात उन दिनों की है जब मैं अपने छोटे भाई के साथ एक मांटेसरी स्कूल (एस.के.आइडियल,मांटेसरी स्कूल, पथरदेवा) में पढ़ने जाया करता था। उस समय मांटेसरी स्कूल के गुरुजी लोग बहुत हत्यार हुआ करते थे। मुझे याद है एक दिन मैं दोपहर को सबकी आँख बचाकर स्कूल से घर भागने की कोशिश कर रहा था, करता तो हमेशा था पर उस दिन दैव भी मेरे प्रतिकूल थे और ज्योंही बस्ता उठाए स्कूल के बाहर आया एक राय गुरुजी ने दौड़कर मुझे पकड़ लिया। इसके बाद रोल (वह गोल पतला काठ का डंडा जिसमें कपड़े की पीस लपेटी रहती है- इसी का हमलोग डंफल बनाकर पीटी भी खेलते थे) से मेरी इतनी धुनाई हुई कि पूछिए मत। आज भी वह रोल मेरी आँखों के सामने घूम जाता है और न चाहते हुए भी मैं तिलमिला उठता हूँ।

बरसात के दिनों में चांदी

खैर बरसात के दिनों में मेरी चाँदी रहती थी क्योंकि हमें कच्चे रास्तों से होकर स्कूल जाना पड़ता था और मैं खुद या अपने छोटे भाई को कीचड़ में गिरा देता था और कीचड़ सने घर आ जाता था। फिर स्कूल के लिए देरी हो जाती थी और मैं स्कूल जाने से बच जाता था पर कभी-कभी मेरे दादाजी किसी के साथ साइकिल से मुझे स्कूल भिजवा देते थे। पर आज उन कथित हत्यार अध्यापकों के लिए हृदय में अत्यधिक श्रद्धा और आदर है। कितना अपनापन और प्यार था उनके हृदय में बच्चों और अपने कर्तव्य के प्रति। हाँ एक बात और। मैं बचपन में चीनी बहुत खाया करता था। मेरी माँ जो कैंसर की मरीज थीं वे बराबर बी.एच.यू. में ही भरती रहती थीं। घर पर हम भाइयों की देखभाल हमारी दादी ही करती थीं। मैं जब भी घर में घुसता था तो धीरे से रसोईघर में चला जाता था। इधर-उधर नजर दौड़ने के बाद बटुली में से एक मुट्ठी चीनी निकालकर मुँह में डाल लेता था और हाथ झाड़कर चुपके से बाहर आ जाता था। जब दादी पूछती थी कि क्या लिया तो दोंनो खाली हाथ दिखाते हुए तेजी से बाहर भाग जाता था। यह प्रक्रिया दिन में कम से कम 15-20 बार दुहराता था।

किशोरावस्था और युवावस्था की लंठई

अब आइए थोड़ा अपनी लंठई से भी आप लोगों को परिचित करा दूँ। हाँ तो मेरे देखने में लंठई का मतलब यह होता है कि जानबूझकर गलत काम करना पर यह समझना कि जो कर रहा हूँ वह गलत नहीं है। यह मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। कभी-कभी दोपहर या तिजहर के समय हम कुछ यार-दोस्त गाँव से दूर के खेतों की तरफ निकल जाते थे ओर आपस में यह हाड़ाबदी (प्रतियोगिता) करते थे कि दूसरे के खेत में से गन्ना तोड़कर कौन कितना खा सकता है और देखते ही देखते गुल्लों का पहाड़ तो नहीं पर पहाड़ी लग जाती थी। या दूसरों के खेत में से मटर, चना आदि उखाड़कर होरहा लगाते थे। उस समय होरहा खाने का और कचरस (गन्ने का रस) पीने का मजा ही कुछ और होता था। फागुन के महीने में सम्मति (होलिका) गड़ने के बाद हम लोग पतई बिटोरने जाते थे यह कहते हुए (कि चलS लइकवा सम्मती के पतई बिटोरे हो हो।) और किसी के गोहरौरी में से गोहरा उठा लाते थे या किसी की छोटी मड़ई भी उठाकर कभी-कभी होलिका में डाल देते थे।

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सुखी परिवार

बिन्दु (मेरी पत्नी), मैं प्रभात को गोदी में उठाए हुए, और आदित्यानन्द (मेरे बड़े भाई साहब का लड़का।) जूहू के तट पर पहली बार सपरिवार पदार्पण।

 
                                                                                                   ...जारी

और यूं जन्मी कविता...

 

POETRY

वियोगी होगा पहला कवि
आह से उपजा होगा गान
निकल कर नयनों से चुपचाप
बही होगी कविता अनजान

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वि और कविता की महिमा में बहुत सी बातें कही जाती हैं। सुमित्रानंदन पंत की ये पंक्तियां भी कवि और कविता को कुछ अर्थों में परिभाषित करती है। सभ्यता के विकासक्रम में कलाओं के रूप बदलते रहे हैं। कविता ने भी कई रूप बदले। एक बात तो तय है कि इन्सान के भीतर से कविता पहले जन्मी है । गद्य बाद में । उससे भी बाद में उसने लिखना सीखा। प्रकृति की ,निसर्ग की मूल ध्वनियों का अनुकरण ही बना होगा शब्दों का आधार, बोली का आधार और कविता का आधार।

ध्वनि का बोध करानेवाली संस्कृत धातु कै [जिससे कौवा बना] और कु [ जिससे कोयल बनी ] से ही संबंध है संस्कृत के कव् शब्द का जिससे जन्मा कवि। संस्कृत धातु कव् का अर्थ है स्तुति करना । इसके अन्य अर्थ हुए वर्णन करना , रचना करना, चित्रण करना , चित्र बनाना आदि। खास बात यह कि कव् का मूल भी कु [कु+ई] ही है जिसका मूलार्थ है ध्वनि करना। अब कव् शब्द के भावों पर गौर करें तो विशुद्ध ध्वनि से कविता का सफर अपने आप नज़र आ रहा है। कु में निहित ध्वनि ही बनी कोयल की कुहूक। सभी पशु-पक्षियों की चहचहाहट प्रकृति के संधिकाल अर्थात सुबह और शाम को ही सर्वाधिक होती है। मनुश्य ने इसे प्रकृति का गान समझा।

खुद मनुश्य ने जब विकासक्रम में निसर्ग की शक्तियों को पहचाना और उन्हें देवत्व से जोड़ा , उनकी आराधना शुरू की जिसमें सबसे पहले सूर्य ही थे तब उसे भी कव् अर्थात स्तुति ही माना। इस तरह कव् धातु से बना कवि। कवि के गुणों से जो युक्त हो उसे कहा गया काव्य अथवा कविता। गौर करें कि वैदिक ऋचाओं में प्रकृति का स्तुतिगान ही है। कवि शब्द के संस्कृत में व्यापक अर्थ हैं। कवि को सर्वज्ञ, बुद्धिमान, विचारवान, प्रशंनीय, ऋषि और सबसे अंत में काव्यकार माना गया है।

जाहिर सी बात है कि उस दौर में मनीषियों ने जो कुछ अपने आसपास के संसार के बारे में जाना उसे बहुत ही काव्यात्मक संस्कारों के साथ प्रकट किया। सम्पूर्ण अध्ययन , मनन और चिंतन के साथ जो वर्णन अथवा छंदोबद्ध रचना सामने आई उसे काव्य अथवा महाकाव्य कहा गया। चिंतन भी अपने आप में काव्य ही है। जो लोग यह मानते हैं कि कविता सोच-विचार कर नहीं लिखी जाती वे भी सही हैं क्योंकि कु यानी ध्वनि। कुछ कहना भी ध्वनि है। काव्य का चिंतनवाला रूप तो तब बना जब मनुश्य को कविता का महत्व समझ में आया। तब कविता को चिंतन का माध्यम बनाया गया और चिंतन से फिर उपजा काव्य ।     

Monday, July 14, 2008

मुम्बई मइया की गोद में [ बकलमखुद-54]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा और हर्षवर्धन त्रिपाठी को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के ग्यारहवें पड़ाव और पचपनवें सोपान पर मिलते हैं खुद को अलौकिक आत्मा माननेवाले प्रभाकर गोपालपुरिया से। इनका बकलमखुद पेश करते हुए हमें विशेष प्रसन्नता है क्योंकि अब तक अलौकिक स्मृतियों के साथ कोई ब्लागर साथी यहां अवतरित नहीं हुआ है। बहरहाल, प्रभाकर उप्र के देवरिया जिले के गोपालपुर के बाशिंदे हैं । मस्तमौला हैं और आईआईटी मुंबई में भाषाक्षेत्र में विशेष शोधकार्य कर रहे हैं। उनके तीन ब्लाग खास हैं भोजपुर नगरिया, प्रभाकर गोपालपुरिया और चलें गांव की ओर । तो जानते हैं दिलचस्प अंदाज़ में लिखी गोपालपुरिया की अनकही ।

दीदी की कृपा से ऐशो-आराम की जिंदगी

खैर, एक दिन एक गँवई मित्र के साथ काशी गाड़ी से मैं चालू डिब्बे में मुम्बई चला आया। मुम्बई पहुँचते ही मेरी सारी शेखी रफूचक्कर होती नजर आई। जैसा मैंने मुम्बई मइया के बारे में सोचा था वो वैसी बिलकुल नहीं निकलीं। पर उस गँवई मित्र की कृपा से सांताक्रुज में एक सीए के कार्यालय में मेरे सोने की और उनके घर ही खाना खाने की व्यवस्था हो गई। दिन आसानी से बीतने लगे। पर अभी एक महीने भी नहीं बीते थे कि वह मेरा गँवई मित्र गाँव जाने की तैयारी कर दी पर मैं तैयार नहीं हुआ। वह तो चला गया पर मैं टिका रहा। एक दिन विले-पार्ले में मैं अपनी बहन के घर पहुँचा। उसको लगा कि अभी मैं गाँव से ही आ रहा हूँ पर जब मैंने उसे बताया कि मैं एक महीने से मुम्बई में ही हूँ तो वह रोने लगी और मुझे डाँटने लगी क्योंकि मैं उसे बहुत ही छोटा और कच्चा दिख रहा था। फिर उसने मुझे और कहीं जाने से मना कर दिया और मैं वहीं रहने लगा। उधर घरवालों ने भी मेरा नामांकन एमए में करा दिया था। अब मेरा मुम्बइया जीवन और भी ऐशो-आराम का हो गया था, कोई काम तो नहीं था पर पैसे की कमी भी कभी नहीं खली क्योंकि दीदी बराबर
पैसे दिया करती थी यहाँ तक कि दो-तीन सेट कपड़े भी बनवा दिए थे, घड़ी खरीद दी थी और भी जरूरत की अनावश्यक बहुत सारी चींजें। [चित्र परिचय- बुजुर्ग परिजनों में एकदम किनारे मोटे शरीरवाले मेरे पिताजी हैं। उनके बाद बीच में मेरे फूफाजी और उसके बाद मेरे दादाजी। सबसे आखिर में मेरी बुआ हैं।]

आई.आई.टी.जैसे सुरम्य और शैक्षिक संस्थान में

क दिन दीदी के घरवालों के माध्यम से मेरा पदार्पण आई.आई.टी. बाम्बे में हुआ और एक प्राध्यापक की महती कृपा से मैं भाषाओं के क्षेत्र में काम करने लगा। आई.आई.टी. में मुझ जैसे गँवार का टिक पाना बहुत ही मुश्किल था पर मेरी कड़ी मेहनत और लगन तथा उस प्राध्यापक को दिख रही मेरी आंतरिक योग्यता ने मुझे जमाए रखा और मैं U.N.L.(Universal
Networking Language) जो यूएनयू जापान की परियोजना थी पर काम करता रहा। फिर मैंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा और उसी गुरु माननीय प्रा.पुष्पक भट्टाचार्य (http://www.cse.iitb.ac.in/~pb/) की पारखी नजरों ने मुझे इस मुकाम तक पहुँचा दिया कि मुझ जैसे गँवार को भी आई.आई.टी.में हास्टल-जीवन का आनन्द उठाने का मौका मिला। आज मैं हिन्दी और भाषाविज्ञान में एम.ए. हो गया हूँ और पी.एच.डी. के लिए भी प्रयासरत हूँ। आज मेरा पदनाम "शोध सहायक (Research Associate)" है। आई.आई.टी. ने रहने के लिए एक दो शयनकक्ष और एक महाकक्ष वाला कमरा भी मुहैया कराया है। अभी तक मेरे कई सारे शोध-प्रपत्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भी प्रस्तुत हो चुके हैं। आज भी शब्दरूपी ब्रह्म के बारे में अत्यधिक जानने के लिए मैं उत्कंठित हूँ और उसकी सेवा में लगा हुआ हूँ। इस आस में कि शायद एक दिन उस शब्दरूपी ब्रह्म की कृपा मुझ पर हो जाए।

ज मेरे दोनों बच्चे प्रगति (5वीं कक्षा) और प्रभात (2सरी कक्षा) आई.आई.टी.कैंपस में ही पढ़ते हैं। मेरी जीवन-संगिनी श्रीमती बिन्दु, मुम्बई में रहते हुए भी पति को परमेश्वर माननेवाली हैं। सब मिलाजुलाकर आप सब की कृपा से जीवन बहुत ही आनन्द में कट रहा है। मेरे दादाजी भी ठंडी में मेरे पास ही आ जाते हैं। आज मैं अपने पिताजी के लिए भी एक संस्कारी और आज्ञापालक पुत्र हूँ।

अब थोड़ा अपनी असलियत पर उतर आता हूँ न चाहते हुए भी- [ अगली कड़ी में जारी ]

कौवे और कोयल की रिश्तेदारी

कागा काको धन हरै , कोयल काको देत ।
मीठा सबद सुनाय के, जग अपनी कर लेत ।।


बीरदास के इस दोहे का संदेश साफ है कि मधुरवाणी सबको प्रिय है अन्यथा बेचारे कौवे ने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा और न ही कोयल ने किसी का भला किया है। बस फर्क सिर्फ वाणी का है। कोयल और कौवे (कौए) का जिक्र अनादिकाल से हमेशा एक साथ ही आता है। कोयल का उल्लेख जहां मीठी मधुर ध्वनि के लिए होता है वहीं कौवे की आवाज़ को हमेशा से ही कर्कशता का प्रतीक माना जाता है और बेचारे को इसी लिए हर मुंडेर से उड़ाया जाता है। इसके विपरीत कोयल की आवाज़ सुनना मंगलकारी माना जाता है। मधुर आवाज़ वालों को कोयल की संज्ञा दी जाती है यही नहीं आम के पेड़ को कोकिलःआवासः इसीलिए कहा जाता है कि उस पर कोयल निवास करती है। दरअसल कोयल और कौवे की रिश्तेदारी यूं ही नहीं है । दोनो का जन्म एक ही मूल से हुआ है और इसके पीछे है उनकी आवाज़।

देवनागरी के वर्ण में ही ध्वनि का भाव छिपा है। संस्कृत की एक धातु है कु जिसका अर्थ है ध्वनि करना , बड़बड़ाना, कराहना , क्रंदन करना, भिनभिनाना आदि। कलकल शब्द इससे ही बना है जिसमें पत्थरों से टकराकर बहते पानी की ध्वनि छुपी है। इसी कल से बना शोर के अर्थ में कोलाहल । मधुर आवाज़ के लिए प्रसिद्ध कोयल का नामकरण भी इसी सिलसिले की कड़ी है इसे । कोकिला के नाम से भी जान जाता है जिसका जन्म संस्कृत की कुक् धातु से हुआ है जिसमें ध्वनि करना या कूकने की ध्वनि का भाव है। संस्कृत कोकिलः से कोयल बनने में कोइल > कोइलो > कोएल > कोयल जैसा क्रम रहा होगा। कोयल की आवाज के लिए कुहुक या कुहू कुहू जैसी ध्वनियो का इस्तेमाल होता है। कोयल के लिए अंग्रेजी का कुकू (cuckoo) शब्द भी ध्वनि अनुकरण के आधार पर ही बना है और संस्कृत की कुक् धातु से इसकी समानता गौरतलब है। इससे ही एक शब्द और बना है काकली अर्थात् मधुर-मधुर ध्वनि। यह कोयल की स्वर लहरियों के लिए भी कहा जाता है। निराला जी की एक कविता भी है सान्ध्य काकली। निरंतर कुछ न कुछ चुगते हुए कुट-कुट ध्वनि करने वाले मुर्गे के लिए कुक्कुटः शब्द भी इसी क्रम में आता है।

कौवे के लिए संस्कृत में काकः कहा जाता है । यह बना कै धातु से जिसका मतलब है ध्वनि करना या शोर मचाना इसीलिए हिन्दी में कांव-कांव करना मुहावरा है जिसका मतलब ही है शोरमचाना। कै से बने काकः से कौवा बनने का क्रम कुछ यूं रहा काकः > कागओ > कागो > कागु > कागा > काआ> कौआ या कौआ । हिन्दी की देशी बोलियों में इसके लिए कागा शब्द भी प्रचलित है। कौवा या कौआ जैसे रूप भी प्रचलित हैं। माना जाता है कि कौवे की एक आंख ही होती है इसीलिए एकाक्ष या काणाकौवा जैसे शब्द भी बने। मनहूस के लिए आमतौर पर इसे इस्तेमाल किया जाता है। पतंग के लिए कनकव्वा जैसा देशी शब्द भी इसी तरह बना । कर्ण+काक=कनकव्वा । काग़ज के चारों कर्ण (कोने) पर बांस की खपच्ची लगाने की वजह से ही इसका यह नामकरण हुआ होगा । फिजूल घूमना, निठल्लेपन के लिए कव्वे उड़ाना जैसे मुहावरे में भी इसकी महत्ता साफ है। अब बेकार आदमी से मुंडे़र से अपशकुनी कौवे ही उड़वाए जाएगे या फिर वह कनकव्वे उड़ाएगा। अंग्रेजी में कौए के लिए क्रो शब्द है और इसकी कौवे से साम्यता गौरतलब है। वहां भी ध्वनि ही काम कर रही है। आर्तनाद, मदद के लिए आवाज़ लगाने, शोरमचाने , पुकारने के अर्थ में अंग्रेजी में क्राई शब्द है। हिन्दी में क्रंदन है। जाहिर है कि ध्वनि अनुकरण के आधार पर ही ये शब्द बने होंगे।

पुराणों में काकभुसुंडि का भी उल्लेख है जिसके मुताबिक भगवान शिव ने हंस का रूप धारण कर काकभुसुंडि नामक कौवे से रामकथा सुनी थी। दरअसल वे पहले एक ब्राह्मण थे और शापग्रस्त होकर काकयोनि में पहुंच गए थे ।

Sunday, July 13, 2008

एक अलौकिक आत्मा- गोपालपुरिया [बकलमखुद - 53]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा और हर्षवर्धन त्रिपाठी को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के ग्यारहवें पड़ाव और चौवनवें सोपान पर मिलते हैं खुद को अलौकिक आत्मा माननेवाले प्रभाकर गोपालपुरिया से। इनका बकलमखुद पेश करते हुए हमें विशेष प्रसन्नता है क्योंकि अब तक अलौकिक स्मृतियों के साथ कोई ब्लागर साथी यहां अवतरित नहीं हुआ है। बहरहाल, प्रभाकर उप्र के देवरिया जिले क