Monday, November 9, 2009

सच्चाई क्या है? [मातृभाषा-3]

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पिछली कडियों में आपने पढ़ा- मातृभाषा से तात्पर्य उस भाषा से कतई नहीं है जिसे जन्मदायिनी मां बोलती रही है। मेरी नज़र में बच्चे का शैशव जहां बीतता है, उस माहौल मे ही जननि भाव है। जिस भाषा के माध्यम से वह अन्य भाषाएं सीख रहा है, वही महत्वपूर्ण है। यही उसका मातृ-परिवेश कहलाएगा। अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान कायम रखने में अगर हम सफल होते हैं तब मातृभूमि या जन्मभूमि को हम क्षेत्रीय पहचान से जोड़ कर देख सकते हैं वर्ना मातृभाषा, मातृभूमि जैसे सवालों का जवाब सिर्फ और सिर्फ हिन्दी और भारत के सिवा और कुछ नहीं हो सकता। विस्तार से देखें-(मातृभाषा-1/ मातृभाषा-2)
रा ष्ट्रभाषा ज्यादा व्यापक शब्द है या मातृभाषा ? तकनीकी तौर पर तो राष्ट्रभाषा ही व्यापक शब्द है। मगर यहां भी नजरिया महत्वपूर्ण है। मध्यकाल में यूरोप में लिंगुआ फ्रांका टर्म चल पड़ी थी जिसका अर्थ सम्पर्क भाषा या सामान्य भाषा से था। मातृभाषा, राष्ट्रभाषा जैसे विशेषणों को हम केवल काग़ज़ी खानापूर्ति या बेहद ज़रूरी वर्गीकरणों के लिए सुरक्षित छोडें। यह अस व्यक्ति पर निर्भर करता है कि किसे वह मातृभाषा का दर्जा देना चाहता है। राष्ट्रभाषा तो जाहिर है, पसंद के इस दायरे से बाहर है, क्योंकि वह विधान-सम्मत तथ्य है। आज अक्सर राष्ट्रभाषा हिन्दी के भविष्य को लेकर चिंता प्रकट करते हुए अंग्रेजी को सम्पर्क भाषा के तौर पर विकसित होते जाने की बात कही जाती है। मेरा स्पष्ट मानना है कि इस देश की निर्विवाद लिंगुआ फ्रांका हिन्दी ही है। व्यापक तौर पर पाकिस्तान को भी शामिल कर लें, क्योंकि उर्दू को मैं अलग भाषा नहीं हिन्दी की शैली समझता हूं, तो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की लिंगुआ फ्रांका हिन्दुस्तानी ही है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा चाहे 1950 में सांविधानिक तौर पर मिला हो, मगर इस देश की साझी संस्कृति ने हिन्दुस्तानी को सदियों पहले लिंगुआ फ्रांका मान लिया था और उदार हृदय से भारत के चारों कोनों ने इसे स्वीकार कर लिया था। यही वजह रही कि देश भर में हिन्दी के विभिन्न रूप बोले जाते हैं।
Indoeuropean language family tree
बदला है स्वरूप भी
हिन्दी आज जिस रूप में बोली जाती है, तीन सदी पहले भी इससे मिलती-जुलती भाषा बोली जा रही थी जिसे हिन्दुस्तानी  कहा जाता था क्योंकि उसमें अरबी-फारसी के शब्द भी शामिल थे। महाराष्ट्र वाले उसे हिन्दुस्तानी कहते थे तो उत्तर वाले उसे दक्कनी। उससे भी कई सदियों पहले प्राकृतों के जरिये अलग अलग सम्पर्क भाषाएं रहीं। मागधी प्राकृत से बांग्ला जन्मी मगर मराठी के विषय में विद्वान एकमत नहीं है। मोटे तौर पर तो इसका जन्म महाराष्ट्रीय प्राकृत से माना जाता रहा है। दक्षिणापथ के विशाल क्षेत्र को जानेवाले विभिन्न मानव समूह महाराष्ट्र में अलग अलग कालखंडों में बसते रहे। मराठी पर पैशाची प्राकृत का प्रभाव भी है और शौरसेनी का भी। सुदूर मगध से भी यहां जनसमूह आकर बसे हैं और पश्चिम में बृज प्रदेश से लेकर पंजाब तक से आप्रवासी आते रहे हैं। आज की मराठी इन्ही विभिन्न भाषा-भाषी समूहों के साथ सदियों से हो रहे हेलमेल से बनी है। वेदकालीन प्राकृतों के इतने वर्गीकरण नहीं थे। ये बाद में विकसित हुए हैं। विभिन्न प्राकृतों पर स्थानीय बोलियों का प्रभाव भी पड़ा ही होगा। कहने का तात्पर्य यही है कि विभिन्न कालखंडों में मातृभाषा का स्वरूप बदला है। प्राकृतों के उदाहरण से साफ है कि ज्यादातर प्रांतीय बोलियां कभी मूल प्राकृत का ही हिस्सा थीं।
हिन्दुस्तानी के सम्पर्क भाषा के रूप में विकसित होने के क्रम में ही देश के विभिन्न भाषा-भाषी समूहों ने हिन्दुस्तानी सीखनी शुरू की। मराठी और बांग्ला लेखकों के लिए हिन्दी ज्ञान बेहद ज़रूरी था। जो मराठी ब्राह्मण दक्षिणा कमाने उत्तर के राजघरानों के यहां उत्सवों-पर्वों पर जाते थे, उन्हें हिन्दुस्तानी सीखनी अनिवार्य थी। इन्ही में से कुछ समूह उत्तरभारत में ही बस गए। धीरे-धीरे हिन्दुस्तानी उनकी सम्पर्क भाषा से बढ़कर हो गई। परिवार में चाहे मराठी का जोर रहा हो मगर परिजनों के बीच भी हिन्दी का व्यवहार बढ़ा।  मातृभाषा दरअसल वह है जिसके जरिये व्यक्ति शैशवकाल में बाहरी दुनिया को समझता है। मेरे बचपन की बात बताऊं। मुझे याद नहीं आता कि दुनिया को समझने के लिए, मुझे मराठी शब्द का हिन्दी विकल्प अपने परिजनों से पूछना पड़ा हो। इसके ठीक उलट आज तक मैं हिन्दी शब्दों के मराठी विकल्प पूछता हूं। पर मुझे विशाल और समृद्ध मराठी समाज-संस्कृति से जुड़े होने का भाव सुहाता है, सो अपनी मातृभाषा मराठी ही बताता हूं, मगर सरकारी दस्तावेजों में, जनसंख्या विवरणों में अपनी मातृभाषा हिन्दी ही दर्ज कराई है। तमाम उदाहरणों से जाहिर है, व्यवहारतः मेरी मातृभाषा भी हिन्दी है और सम्पर्क भाषा भी और मुझे इससे एतराज भी नहीं है।  अपने बारे में आप लोग खुद तय करें। हां, मातृभाषा का वैवाहिक स्थिति से भी कोई रिश्ता नहीं है, भौगोलिक स्थिति से भी नहीं और जन्मदायिनी से भी नहीं।
 jioनिष्कर्ष-
कुछ मिसालें देखें-
1.ऐसे व्यक्ति की भाषा क्या होगी, जिसकी मां गूंगी हो? 2.मां पंजाबी, पिता तमिल... बच्चे की मातृभाषा क्या होगी? 3. अंग्रेजी बोलनेवाले दो विभिन्न भाषा-भाषियों की संतान किसे मातृभाषा कहेगी? 4. जन्मते ही माँ को खो चुकी संतान की मातृभाषा क्या होगी? 5.अनाथाश्रम में पलनवाले वे बच्चे जो माँ-बाप का नाम नहीं जानते, किसे मातृभाषा कहेंगे ?
ऐसे अनेक दिलचस्प उदाहरण लिये जा सकते हैं जो मातृभाषा की रिश्ता अंततः परिवेश से ही स्थापित करते हैं।
भाषाएं लगातार परिवर्तनशील रही हैं। यह जनसमूहों पर छोड़ दिया जाए कि वे अपने लिए कौन सी भाषा चुनते हैं। भाषा स्वतः विकसित होती चलती है। मानकीकरण जैसा कोई भी अनुशासन भाषा को विकसित होने से रोकता है। अलबत्ता साहित्य की भाषा में व्याकरण का अनुशासन जरूरी है। बोलचाल की भाषा प्रवहमान रहे इसके लिए तमाम दुराग्रहों को छोडना होगा। भाषाओं के मिटने की बात पर भी अक्सर चिंता जताई जाती है, वह भी बेमानी है। किन्ही सौ लोगों के समूह में बोली जानेवाली भाषा दो साल बाद नहीं रहेगी ...इस पर सियापा करने का कोई अर्थ नहीं है। सृष्टि में बनने-बिगड़ने का क्रम जारी है। यह सामान्य गति से होता रहे। हम इसकी वजह न बनें। पहले भी कई भाषाएं थीं, जो आज नहीं हैं।
...और अंत में
व्यक्ति जिस भाषा में अपने सुख-दुख, आश्चर्य या अन्य भावों को व्यक्त करने में सक्षम हो...वही उसकी मातृभाषा है। चोट लगने पर मेरे मुंह से कभी मराठी में अगं आई नहीं निकलता अर्थात मां याद नहीं आती। आप जिस भाषा में सपने देखते हैं, वही आपकी मातृभाषा है। यहां अकबर बीरबल के बुद्धिविलास के उस प्रसंग को याद करें जब अकबर ने एक गुमनाम मगर बहुभाषी व्यक्ति की असली भाषा जानने का काम बीरबल को सौपा। बीरबल ने उस व्यक्ति पर ठंडा पानी तब डाला जब वह गहरी नींद में था...वह आदमी चौंक कर कुछ बड़बड़ाते हुए उठ खड़ा हुआ। अगले दिन बीरबल ने बादशाह को बताया कि उस व्यक्ति की भाषा गुजराती है। पूछने पर बीरबल ने भी भाव सम्प्रेषण वाली उक्त बात ही कही थी।
समाप्त

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Sunday, November 8, 2009

सांस्कृतिक पहचान ज़रूरी है [मातृभाषा-2]

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पिछली कड़ी में आपने पढ़ा- अक्सर मातृभाषा शब्द का अभिप्राय उस भाषा से लगाया जाता है जिसे मां बोलती है। मातृभाषा से तात्पर्य उस भाषा से कतई नहीं है जिसे जन्मदायिनी मां बोलती रही है। मेरी नज़र में बच्चे का शैशव जहां बीतता है, उस माहौल मे ही जननि भाव है।  जिस भाषा के माध्यम से वह अन्य भाषाएं सीख रहा है, वही महत्वपूर्ण है। यही उसका मातृ-परिवेश कहलाएगा।

क दिलचस्प मिसाल। पिछली जनगणना में उत्तरप्रदेश और बिहार के करीब साठ हजार लोगों ने अपनी मातृभाषा अरबी लिखवाई। जनगणना मंत्रालय के उच्चाधिकारी भी इस तथ्य से हैरत में थे। विश्लेषण से पता चला कि ये सभी लोग उन  अति पिछड़े इलाकों के थे, जहां मदरसे चलते हैं। इन लोगों की माँओं की भाषा भोजपुरी और अवधी है। पिता भी यही बोलते हैं पीढ़ियों से। इसके बावजूद अरबी को मातृभाषा कहना मूर्खता से बढ़कर कुछ नहीं है। ऐसा उन्होंने धर्म के आधार पर किया है। अगर इतनी तादाद में मुसलमान अरबी जानते हैं तो इस्लाम की गलत व्याख्या के जरिये उन्हें कोई भी ताकत बरगला नहीं सकती। वे खुद पढ़ सकते हैं कि कुरआन और हदीस में क्या लिखा है। किसी मौलवी की मनमानी बेमानी हो जाएगी....अफ़सोसनाक बात तो यह कि ज्यादातर पढ़े-लिखे मुस्लिम भी उर्दू लिपि नहीं जानते, ऐसे में अरबी को पढ़ने-समझने की बात ही अलग है। जनगणना में कई मुसलमानों ने अपनी मातृभाषा हिन्दी भी लिखवाई है।
मातृभाषा पर राजनीति
स संदर्भ में एक तथ्य महत्वपूर्ण है। राजनीतिक कारणों से बीते दशकों में उर्दू को मातृभाषा घोषित करनेवाले मुस्लिम नागरिकों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। आज़ादी से पहले जो मुस्लिम हिन्दी या हिन्दुस्तानी को मातृभाषा लिखवाते थे, वे इसकी जगह उर्दू को यह दर्जा देने लगे। कश्मीर का मामला दिलचस्प है। वहां उर्दू को राजभाषा घोषित करने के बावजूद बहुसंख्यक लोग कश्मीरी को मातृभाषा लिखवाते हैं। मातृभाषा के क्षेत्र में राजनीतिक अध्ययन दिलचस्प साबित हो सकता है। गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, पंजाब, तमिनाडु, आंध्रप्रदेश और बांग्लादेश जैसे assembly_childrens_day_nov20 राज्यों के मुसलमानों में उर्दू को मातृभाषा लिखवाने की वृत्ति कितनी बढ़ी है, इस पर सामान्य शोध कराया जाए।  इन सभी राज्यों की परिवेशगत भाषाएं वही हैं, जो इनका भौगोलिक और भाषायी नाम है। इन राज्यों में उर्दू का वैसा मज़बूत आधार नहीं है जैसा उत्तरप्रदेश, बिहार या दिल्ली में है। गुजरात का पारसी, फारसी न बोलकर ठाठ से गुजराती ही बोलता है। पर राजनीति इस अति अल्पसंख्यक तबके पर असर नहीं डालती। नेताओं के निशाने पर हमेशा मुस्लिम तबका रहा है।
मातृभाषा-राष्ट्रभाषा-मातृभूमि-
मातृभूमि शब्द में जिस तरह से मां शब्द प्रतीक स्वरूप हर किसी को समझ में आता है, वैसे ही मातृभाषा में भी मां का प्रतीक ही महत्वपूर्ण है। मातृभूमि, जन्मभूमि जैसे शब्दों का प्रयोग एक दूसरे के विकल्प के तौर पर होता है। इनके प्रयोग पर कोई विवाद नहीं हैं बशर्त जन्मभूमि और जन्मस्थान के अर्थ में हम घालमेल न करें। इनमें फर्क है। हम चाहे तो तो दोनो शब्दों की अलग-अलग व्याख्या कर सकते हैं, अन्यथा दोनों शब्दों में एक ही भाव है। मातृभूमि को राष्ट्र के अर्थ में भी समझा जाता है और जन्मभूमि को जन्मस्थान के संदर्भ में भी देखा जाता है। वाल्मीकि रामायण की यह प्रसिद्ध उक्ति “जननि जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” में जन्मभूमि का अभिप्राय व्यापक रूप में प्रांत, प्रदेश, राज्य, देश आदि से ही है। इन तमाम शब्दों का, आज के संदर्भ में अर्थ न लगाया जाए। आज इन शब्दों के मायने बदल गए हैं और अलग अलग प्रशासनिक-राजनीतिक विभाजनों मे इन्हें देखा जाता है। मगर इस व्याख्या में इनका अभिप्राय राष्ट्रीय पहचान से ही है। जन्मभूमि, मातृभूमि को वैश्विक संदर्भ में देखे तो भी यह साफ है। मातृभूमि का अर्थ हुआ-
1. स्वदेश, जहां के आप निवासी हैं। 2.आपके पुरखों की भूमि. 3. आपकी जातीय सांस्कृतिक पहचान वाला स्थान. 4. वह स्थान, जहां आप जन्में हैं.
एक उदाहरण-
मातृभाषा के संदर्भ में मिसाल के तौर पर मेरा जन्म मध्यप्रदेश के सीहोर में हुआ पर मेरी स्मृति में सीहोर नहीं है। राजगढ़ (ब्यावरा) में ही बचपन से युवावस्था तक का समय बिताया। महत्व राजगढ़ का ही है, क्योंकि उसी परिवेश में, मैं बड़ा हुआ हूं, जहां की भाषा हाड़ौती से प्रभावित मालवी है। इस क्षेत्र का भौगोलिक नाम उमठवाड़ है। यहां की बोली home_langues_260 मालवी कम, उमठवाड़ी ज्यादा कहलाती है। स्पष्ट है कि इसका मेरे व्यक्तित्व पर असर भी है भाषा और संस्कार दोनों स्तरों पर। सीहोर-राजगढ़ दोनों ही मालवांचल में आते हैं, इसलिए क्षेत्रीय पहचान के तौर पर मैं खुद को मालवी कहने में ज्यादा सुविधा महसूस करता हूं। इसके बावजूद मेरा खुद को मालवी कहना मातृभूमि के सवाल का जवाब नहीं है। मैं मुख्य सवाल से बच रहा हूं, घुमा रहा हूं। उपरोक्त वर्गीकरण के तहत देखें तो सिर्फ जन्म हो जाने भर से मेरा सीहोर से कोई भावनात्मक लगाव नहीं बनता। सीहोर मेरे सपने में नहीं आता, राजगढ़ आता है क्योंकि वह मेरे परिवेश का हिस्सा था। महाराष्ट्र जहां से मेरे पुरखे आए हैं और आकर ग्वालियर में बसे, वह ज़रूर मेरी मातृभूमि हो सकती है, क्योंकि पुरखों के द्वारा बोली जाने वाली मराठी भाषा और पृथक सांस्कृतिक पहचान के साथ ही मैं राजगढ़ में बड़ा हुआ। हमे मराठी कहा जाता है। हमारा परिचय महाराष्ट्रीय समूह के तौर पर दिया जाता है, सो तार्किक रूप में मेरी मातृभूमि महाराष्ट्र है, यह मानने में मुझे कोई दिक्कत नहीं हैं।
एकीकृत सांस्कृतिक पहचान 
किन्तु यह दृष्टिकोण तब तक ही तर्कसंगत था जब तक भारत की पहचान भारतवर्ष के रूप में थी, जिसके अलग अलग हिस्से स्वायत्त पहचान रखते थे, तब स्वदेशी पहचान का अर्थ या मातृभूमि का अर्थ वही था जिसकी विवेचना ऊपर की है। मगर आज जब भौगोलिक परिभाषाएँ बदल चुकी है, वैश्विक परिदृष्य बदल चुका है, तब व्यापक अर्थ में मेरी मातृभूमि भी भारत ही कहलाएगी, अलबत्ता जन्मभूमि सीहोर है। मेरी सांस्कृतिक पहचान भारत भूमि की एकीकृत सांस्कृतिक पहचान से जुड़ेगी। मेरा महाराष्ट्रीय होना महत्वपूर्ण तब है जब महाराष्ट्रवासी महाराष्ट्रीय बंधु उदार हृदय से मुझे मराठी मानें। वे ऐसा नहीं करते हैं। यह अनुभव मुझे हो चुका है। शायद अन्य भाषा-भाषी बधुओं को भी हुआ हो जो बरसों पहले अपनी जड़ों से उखड़ कर हिन्दी या अन्य भाषा-भाषी क्षेत्रों में जा बसे हैं। अलबत्ता उत्तर भारत के जिन हिस्सों में हम पले बढ़े हैं, अगर हिन्दी भाषी संस्कारों के बावजूद मेरे नाम के साथ जुड़े वडनेरकर के चलते, मुझे मराठी समझा जाता है तो भी मुझे कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि इस विशाल क्षेत्र ने मराठियों के साथ कोई भेदभाव नहीं किया है, उल्टे कई मामलो में सहर्ष हमारी संस्कृति को यहा सराहना मिली है। अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को जब तक हम और हमारी पीढ़ियां कायम रख पाते हैं, तब तक मुझे खुद को मराठीभाषी या मराठी कहने मे कोई परेशानी नहीं है। मगर यह भी कहूंगा कि हमारी संस्कृति हिन्दी क्षेत्रों में चाहे अलग पहचानी जाती हो, मगर हमारे आचार व्यवहार अब वैसे नहीं रह गए हैं जैसे मूल महाराष्ट्रवासियों के हैं। आचार-व्यवहार का यही फर्क पुणे-नागपुर में थोड़ा सा वक्त गुजारने पर साफ समझ में आता है। ऐसे में वे भेदभाव के दोषी भी नहीं कहे जा सकते। अलबत्ता यह साफ है कि मातृभूमि शब्द में जिस तरह से मातृ शब्द मूल पहचान से जुड़ा है, उस पर ही इस शब्द पर विचार करते समय गौर करना चाहिए। इस मूल पहचान का हमारे वर्तमान से कितना रिश्ता है।
-अगली कड़ी अंतिम

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Saturday, November 7, 2009

प्रभाषजी की यादें…

वे Prabhash Joshiसिर्फ पत्रकार नहीं थे। यूं पत्रकार का व्यक्तित्व भी बहुआयामी होता है मगर बहुधा इस धंधे में  आने के बाद समझदार पत्रकार खुद को लगातार मांजते हुए कई क्षेत्रों में पारंगत हो जाता है या वैसा लोगों को नज़र आता है। मगर प्रभाष जी के साथ ऐसा नहीं था। वे पत्रकारिता में बाद में आए, उससे पहले तमाम तरह के सामाजिक सरोकार उनके भीतर प्रभावी हो चुके थे जिसने उनके भीतर के पत्रकार को परिपक्व और पायेदार बनाया। सर्वोदय, गांधीवाद, पत्रकारिता, क्रिकेट, संगीत-सिनेमा, लोक- संस्कृति के अलावा जीवन के और न जाने कितने रूप थे, जिन्हें देखने का कोई मौका उन्होंने हाथ से जाने न दिया। मैं उन्हें एक बेबाक पत्रकार के तौर पर हमेशा याद रखूंगा जिसने लगातार प्रतिक्रियावादियों को चीखने-चिल्लाने के मौके उपलब्ध कराए, मगर एक जबर्दस्त,सहनशील फील्डर की तरह वे कभी उत्तेजित नहीं हुए, सब्र और शालीनता के साथ अपनी मान्यता पर स्थिर रहे। नतीजतन उनके विरोधियों को भी उनका लम्बा मौन खलता था। प्रभाषजी से आत्मीयता या घरोपा का कोई दावा अपन नहीं करते, मगर उनसे परिचित हुए ढाई दशक से भी ज्यादा हो चुका है। इस दौरान दिल्ली, हरिद्वार, जयपुर और भोपाल में  मिलना होता रहा। सन् 1983 में राजगढ़ से हिन्दी में एमए करने के बाद मैं मुजफ्फरनगर (उप्र) में हिन्दी के ख्यात विद्वान डॉ विश्वनाथ मिश्र के साथ बतौर शोध-सहायक था। वे पौर्वात्य और पाश्चात्य साहित्य शास्त्र के तुलनात्मक अध्ययन पर यूजीसी की ओर से शोधकार्य कर रहे थे। हर हफ्ते हरिद्वार अपनी ननिहाल आना जाना होता, जहां मामा  कमलकांत बुधकर की सोहबत में साहित्यिक-सास्कृतिक और पत्रकारिता संबंधी गतिविधियों से जुड़ने और सीखने का मौका मिलता। ऐसे ही एक अवसर पर  में कभी प्रभाष जी से पहली मुलाकात हुई।
रिद्वार की साहित्यिक –सांस्कृतिक संस्था वाणी ने प्रख्यात व्याकरणाचार्य आचार्य किशोरीदास वाजपेयी की स्मृति में एक व्याख्यानमाला का आयोजन किया था। उस कार्यक्रम में सरस्वती वंदना गाने की जिम्मेदारी मुझे दी गई। समारोह में राजेन्द्र माथुर भी थे। माथुर साहब से पहले से परिचित था क्योंकि राजगढ़ में रहते हुए मैं नई दुनिया में पत्र संपादक के नाम स्तम्भ के लिए खूब चिट्ठियां लिखा करता। माथुर साहब खुद चिट्ठियां पढ़ते और इसी नाते वे मेरा नाम जानते थे। बाद में वे नवभारत टाइम्स के संपादक बन कर दिल्ली आ गए। समारोह के बाद हमारे घर  रात को महफिल जमी। माथुर साहब, प्रभाष जोशी शॉल ओढ़ कर बैठे थे। कविताओं का दौर चला। मामा ने कविताएं सुनाई। हमें ताज्जुब हुआ कि प्रभाष जी ने खुद होकर एक कविता सुनाने की घोषणा की। मुझे नहीं पता था और वहां बैठे लोग भी नहीं जानते थे कि प्रभाष जी कविता भी लिखते हैं। उन्होंने कुछ समय पहले की  प्रभासपट्टन (गुजरात) की यात्रा के दौरान लिखी कविता सुनाई। बाकायदा उनकी डायरी साथ थी और उसे देख कर कविता-पाठ हुआ। शीर्षक भी प्रभास तीर्थ ही था। कविता को सबने पसंद किया। माथुर साहब ने अपने चिरपरिचित अंदाज में कहा था- अर्थात् आपका यह काम भी अभी चल रहा है!!!
सके बाद संगीत का दौर चला। मुझे गाने के लिए कहा गया। प्रभाष जी को याद था कि मैने वीणावादिनी की वंदना गाई थी। उन्होंने प्रोत्साहित किया। आमतौर पर मैं कभी पंकज उधास की ग़ज़ल नही गाता था, पर पता नहीं, उस दिन उन्ही की कोई चीज़ सुनाई। सबने पसंद की। प्रभाष जी ने भी तारीफ की मगर कहा- जितना अच्छा गाते हो, तब यह भी सीखो कि गले की खूबी को उजागर करनेवाली चीज़ों का चुनाव कैसे किया जाए। मैं समझ गया था। और गाने की फ़रमाईश हुई। उसके बाद जगजीत साहब की कुछ ग़ज़लें सुनाई जिस पर दोनों काफी खुश हुए। प्रभाष जी मराठी भी बहुत अच्छी बोलते थे। जाते-जाते प्रभाष जी ने मुझे गाने को लेकर सचेत किया और मराठी मे कहा– सोड़ू नकोस...अर्थात इस कला को छोड़ना नहीं है। मेरा दुर्भाग्य, कि वह तो छूट चुकी है। इसके बाद जब भी उनसे मिलना होता, हमेशा यही पूछते कि गाने का अभ्यास चल रहा है या नहीं।
रिद्वार दो-तीन बार अलग अलग अवसरों उनसें मुलाकातें हुईं।  साथ साथ गंगा किनारे घूमना फिरना हुआ। वे गुरुगंभीर संपादकों जैसे नहीं थे। मुझ जैसे कॉलेजिएट छोकरे से बड़ी सहजता से बतियाते थे। एक बार (संभवतः अर्धकुम्भ से पूर्व ) वे हरिद्वार आए। गंगापार डाम कोठी में ठहरे थे। शाम को मामा कमलकांत बुधकर के साथ हर की पौड़ी पर आरती में जाने का कार्यक्रम था। प्रसंगवश बताता चलूं कि हर की पौड़ी पर, गंगा की बीच धार में जो इकलौता गंगा मंदिर है, पीढ़ीगत रूप से वह मेरे ननिहाल के कुटुम्ब यानी बुधकर परिवार के पास है। इस मंदिर की परिक्रमा में बैठकर गंगामैया की आरती का जो दृष्य दिखता है, वह अद्भुत होता है। गंगामैया की कृपा से हम बचपन से यह पुण्य-सुख ले रहे हैं। खैर, हम जब डामकोठी पहुंचे तब प्रभाष जी करीब करीब तैयार थे। उन्होंने मामा से कहा- कमलजी, आप चाय वाय पीजिए, तब तक मैं
scan0001 हरिद्वार में वाणी द्वारा आयोजित आचार्य किशोरदास वाजपेयी व्याख्यानमाला में दाएं से गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ बलभद्र कुमार हूजा, प्रभाष जोशी, राजेन्द्र माथुर और माइक के सामने खाकसार। चित्र करीब 1983-84 का है।
कुछ लिख लेता हूं। हमें याद आया कि अगले दिन रविवार था। दरअसल उनका प्रसिद्ध स्तम्भ कागद कारे संभवतः तब तक शुरु हो चुका था। संपादकीय पेज पर पूरे ढाई कॉलम में ऊपर से नीचे तक ठसा-ठस होता था वह। किसी हालत में ढाई हजार शब्दों से कम नहीं। हमे लगा, आरती तो छूटी समझिए। वे लिखते रहे, हम चाय पीते रहे। ताज्जुब था कि प्रभाष जी ने मुश्किल से पंद्रह मिनट में अपना काम खत्म कर लिया। पता चला कि अभी आधा लिखा है, बाकी वे रास्ते में लिखेंगे। मंदिर पहुंचने पर प्रभाष जी ने फिर कलम संभाली और बाकी लेख पूरा किया। फिर मुझसे कहा कि  पण्डित, अब इसे दिल्ली पहुंचाने की जिम्मेदारी तुम्हारी। डाकघर जाकर मैने उसे जनसत्ता के कार्यालय में फैक्स किया।
1985 में  नवभारत टाइम्स में उपसंपादक बनकर मैं जयपुर आ गया। करीब तीन-चार साल बाद वहां उकताहट होने लगी। इस बीच जनसत्ता का मुंबई संस्करण भी शुरू हुआ। मामा जी ने किसी मुलाकात के दौरान मेरी इच्छा उन्हें बताई। तत्काल उन्होंने दिल्ली बुलवाया। प्रभाष जी ने स्पष्ट किया कि मुंबई में मकान की बड़ी दिक्कत है। तुम्हें अपने रहने की व्यवस्था देख कर ही वहां जाने का मन बनाना चाहिए। मुंबई की इस खासियत के बारे में जो न जानता हो, वह मूर्ख। मकान अब ज्यादा आसानी से मिलने लगे हैं, तब सचमुच मुश्किल थी। खैर, उन्होंने मुंबई जाने को कह दिया। पर मैं चुपचाप बिना कुछ कहे जयपुर भाग आया और नभाटा में जमा रहा। उसके कुछ साल बाद दिल्ली में फिर प्रभाष जी से उनके दफ्तर में मिलने गया। बातचीत चल ही रही थी कि लम्बा कुर्ता पहने एक सज्जन ने कमरे में प्रवेश किया। प्रभाष जी ने परिचय कराया कि ये राहुलदेव हैं और मेरे बारे में उन्हें बताया कि ये हरिद्वार के पंडित कमलकांत बुधकर के भांजे अजित हैं। नाम सुनकर राहुल जी ने मुझे गौर से देखा। प्रभाष जी जोर से हंसे, बोले – हां, यही है वो...भापड़ा झोपडपट्टी में रहने के डर से तुम्हारे पास नहीं आया। राहुलजी जनसत्ता मुंबई के स्थानीय संपादक थे। मैं मन ही मन उस बात से शर्मिंदा तो था ही, यह जानकर कि प्रभाष जी ने सचमुच मुझे मुंबई के लिए चुन लिया था, पर मैंने ही उन्हें धोखा दिया, ग्लानि के मारे फिर कुछ बोल ही नहीं सका।
प्रभाषजी को धोखा देने का एक कलंक और लगा। नभाटा में करीब आठ साल काम करते हो चुके थे। 1991-92 में फिर उनके दरवाज़े पर दस्तक दी। तब जनसत्ता का चंडीगढ़ संस्करण भी शुरू हो चुका था। उन्होंने मुझे चंडीगढ़ जाकर तत्कालीन स्थानीय संपादक ओम थानवी से मिलने को कहा। मैं चंडीगढ़ पहुंचा। ओमजी ने कहा- आपकी औपचारिक परीक्षा का कोई मतलब नहीं है। ऐसा करिये कुछ घूम आइये। या मन न हो तो लाईब्रेरी में बैठकर पुरानी फाईलें देख डालिये और जिस विषय पर मन करे,एक रिपोर्ट लिख दीजिए। मैने दोनो के बीच का रास्ता चुना। पता चला कि उसी दिन तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंतसिंह की सरकार ने सौ दिन पूरे किए थे। बस कुछ देर घूम-घाम कर लोगों से बातचीत की और फिर लाइब्रेरी में आकर अखबारों को खंगाला और एक रिपोर्ट बना कर ओमजी को दे दी। ओमजी ने मुझे जल्दी ही सूचना देने की बात कह कर जाने की इजाज़त दे दी। वापसी में फिर प्रभाष जी से मिला। उन्होंने मेरे सामने फैक्स लहराते हुए बताया कि मेरी रिपोर्ट चंडीगढ़ से उनके पास पहुंच चुकी है। जल्दी ही आगे की सूचना मिलेगी। एक हफ्ते के भीतर सकारात्मक सूचना भी आ गई। इस बीच कई लोगों ने कहा कि जनसत्ता चंडीगढ़ तो बंद होने वाला है। नभाटा में मेरे जाने की सूचना जब मैने दी तो मुझे जयपुर में ही एक प्रमोशन दे दिया गया। मैंने फिर जनसत्ता जाना टाल दिया। यह बात 1991-92 की है। उसके बाद से प्रभाषजी से मिलने से मैं खुद होकर कतराने लगा। हालांकि रूबरू होने के अवसर भी आए, उन्होंने कभी यह जाहिर नहीं किया कि वे मुझसे नाराज हैं। उनके सानिध्य और नेतृत्व वाले अखबार में काम करने का अवसर न छोड़ता तो निश्चित ही बौद्धिक, आर्थिक और अनुभव की दृष्टि से आज की तुलना में कई गुना समृद्ध होता। पर यह सिर्फ सोच है। होता वहीं है जो नियति ने तय किया है। खुद प्रभाष जी ने कहां तय किया था कि वे क्रिकेट के घाट पर ज्यादा दिन गुजारेंगे या पत्रकारिता के तट पर। सर्वोदय धाम में ज्यादा रमेंगे या लोक-संस्कृति के मेले में।
प्रभाष जी पर अभी लम्बे समय तक शोध चलता रहेगा। निश्चित ही आज के दौर में जब नई पीढ़ी के युवा पत्रकारों को राजेन्द्र माथुर का नाम नहीं पता, यह उस पीढ़ी पर एक एहसान की तरह है कि प्रभाष जी इतना जिए। अफ़सोस और गुस्सा आता था कि एक ही वक्त में पत्रकारिता का नया रंगरूट माथुर साहब और प्रभाष जी के नाम के साथ फर्क करता था। प्रभाषजी ने रिपोर्टिंग की जो भाषा पत्रकारों को सिखाई, वैसा काम उनके अग्रज या समकालीन अन्य कोई संपादक नहीं कर पाए। राजेन्द्र माथुर भी नहीं। प्रभाष जी निश्चित ही अभी और जी जाते। वे सक्रिय थे और लिख भी रहे थे। कुछ योजनाएं भी भविष्य की रही होंगी। पर काल के रजिस्टर में शायद उनकी जिम्मेदारियां पूरी हो चुकी थीं। जो कुछ वे कर गए हैं, वह वैसे भी इतना महत्वपूर्ण है कि हर पत्रकार उनके दौर को याद करना चाहेगा। कारपोरेट दबावों के आगे चाहे पत्रकारिता का चेहरा आज बदल चुका हो, मगर मुझे भरोसा है कि प्रिंट मीडिया में जनसत्ता युग फिर आएगा।

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Friday, November 6, 2009

क्या है मातृभाषा का मतलब? [मातृभाषा-1]

523261577_bb9336d085मातृभाषा शब्द को लेकर दुनियाभर में ज्यादातर लोग भ्रांति पालते हैं। अक्सर मातृभाषा शब्द का अभिप्राय उस भाषा से लगाया जाता है जिसे मां बोलती है। यह बहस हमारे परिवार में भी पिछले दिनों चली। अहिन्दीभाषी कहलाने के बावजूद हम सभी जन्म से हिन्दीभाषी हैं। मेरे सभी कुटुम्बी अब देश के अलग-अलग हिस्सों में बसे हैं। निरन्तर आपसी संवाद के लिए हमने गूगल ग्रुप पर एक समूह – कम्पुकुल बनाया हुआ है। हर रोज हम सभी कुटुम्बी इसके जरिये एक दूसरे के सम्पर्क में रहते हैं और पारिवारिक से लेकर समाज, राजनीति व तमाम दीगर मुद्दों पर चर्चाएं करते हैं। इससे हटकर रोजमर्रा के तीज-त्योहार और जन्मदिवसीय शुभकामनाओं का आदान-प्रदान भी होता है। औसतन प्रतिदिन इस पर तीस-पैंतीस मेल्स का ट्रैफिक रहता है। पिछले दिनों अनायास मातृभाषा पर बहस छिड़ गई। मुद्दा था, मातृभाषा वह है, जिसे मां बोलती है। मैं इस दृष्टिकोण को नहीं मानता, बल्कि परिवेश में जननि भाव देखते हुए, परिवेश की भाषा को ही मातृभाषा मानता हूं। इस संदर्भ में मैने अपना जो नज़रिया कम्पूकुल के सामने रखा, उसे आपके सामने भी ला रहा हूं क्योंकि शब्दों का सफर भाषा से जुड़ा ब्लाग है, इस नाते इसके पाठक भी कम्पुकुलीन ही हुए। यह काफी लम्बा है इसलिए इसे तीन किस्तों में बांटा है। इसे  पढ़ते समय यह तथ्य ध्यान रखें कि हमारे परिवार मे गैर मराठी वैवाहिक संबंध भी हुए हैं। सवाल ही इसलिए उत्पन्न हुआ कि मेरे ममेरे भाइयों (सौरभ बुधकर, पल्लव बुधकर) की मातृभाषा मराठी होगी या हिन्दी। क्योंकि मेरी मामी  हिन्दीभाषी हैं। आपकी बेशकीमती राय की प्रतीक्षा रहेगी।
मातृभाषा शब्द की भूमिका-
मुद्दा बहुत जटिल नहीं है। सिर्फ मातृ शब्द की वजह से मातृभाषा का सही अर्थ और भाव समझने में हमेशा से दिक्कत हुई है। मातृभाषा बहुत पुराना शब्द नहीं है, मगर इसकी व्याख्या करते हुए लोग अक्सर इसे बहुत प्राचीन मान लेते हैं। हिन्दी का मातृभाषा शब्द दरअसल अंग्रेजी के मदरटंग मुहावरे का शाब्दिक अनुवाद है। मेरा अनुमान है कि यह अनुवाद भी
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बच्चे का शैशव जहां बीतता है, उस माहौल मे ही जननि भाव है। जिस परिवेश में वह गढ़ा जा रहा है, जिस भाषा के माध्यम से वह अन्य भाषाएं सीख रहा है, जहां विकसित-पल्लवित हो रहा है, वही महत्वपूर्ण है।

हिन्दी के संदर्भ में सामने नहीं आया बल्कि इसका संदर्भ बांग्लाभाषा और बांग्ला परिवेश था।  अंग्रेजी राज में जिस कालखंड को पुनर्जागरणकाल कहा जाता है उसका उत्स बंगाल भूमि से ही है। राजा राममोहनराय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे उदार राष्ट्रवादियों का सहयोग अंग्रेजों ने शिक्षा प्रसार हेतु लिया। पूरी दुनिया में बह रही नवजागरण की बयार को भारतीय जन भी महसूस करें इसके लिए भारतीयों को पारंपरिक अरबी-फारसी की शिक्षा की बजाय अंग्रेजी सीखने की ज़रूरत मैकाले ने महसूस की। यहां हम उसकी शिक्षा पद्धति की बहस में नहीं पड़ेंगे। सिर्फ भाषा की बात करेंगे। हर काल में शासक वर्ग की भाषा ही शिक्षा और राजकाज का माध्यम रही है। मुस्लिम दौर में अरबी-फारसी शिक्षा का माध्यम थी। यह अलग बात है कि अरबी-फारसी में शिक्षा ग्रहण करना आम भारतीय के लिए राजकाज और प्रशासनिक परिवेश को जानने में तो मदद करता था मगर इन दोनों भाषाओं में ज्ञानार्जन करने से आम हिन्दुस्तानी के वैश्विक दृष्टिकोण में, संकुचित सोच में कोई बदलाव नहीं आया। क्योंकि अरबी फारसी का दायरा सीमित था। अरबी-फारसी के जरिये पढ़ेलिखे हिन्दुस्तानी प्राचीन भारत, फारस और अरब आदि की ज्ञान-परंपरा से तो जुड़ रहे थे मगर सुदूर पश्चिम में जो वैचारिक क्रांति हो रही थी उसे हिन्दुस्तान में लाने में अरबी-फारसी भाषाएं सहायक नहीं हो रही थी।
भारतीयों को अंग्रेजी भाषा भी सीखनी चाहिए, यह सोच महत्वपूर्ण थी। इसी मुकाम पर यह बात भी सामने आई कि विशिष्ट ज्ञान के लिए तो अंग्रेजी माध्यम बने मगर आम हिन्दुस्तानी को आधुनिक शिक्षा उनकी अपनी ज़बान में मिले। उसी वक्त मदर टंग जैसे शब्द का अनुवाद मातृभाषा सामने आया। यह बांग्ला शब्द है और इसका अभिप्राय भी बांग्ला से ही था। तत्कालीन समाज सुधारक चाहते थे कि आम आदमी के लिए मातृभाषा में (बांग्ला भाषा) में आधुनिक शिक्षा दी जाए। आधुनिक मदरसों की शुरूआत भी बंगाल से ही मानी जाती है।
मातृकुल नहीं, परिवेश महत्वपूर्ण-
मातृभाषा शब्द की पुरातनता स्थापित करनेवाले ऋग्वेदकालीन एक सुभाषित का अक्सर हवाला दिया जाता है-मातृभाषा, मातृ संस्कृति और मातृभूमि ये तीनों सुखकारिणी देवियाँ स्थिर होकर हमारे हृदयासन पर विराजें। मैने इसके मूल वैदिकी स्वरूप को टटोला तो यह सूक्त हाथ लगा- इला सरस्वती मही तिस्त्रो देवीर्मयोभुवः। जिसका अंग्रेजी अनुवाद कुछ यूं किया गया है-
One should respect his motherland, his culture and his mother tongue because they are givers of happiness.
हां दिलचस्प तथ्य यह है कि वैदिक सूक्त में कहीं भी मातृभाषा शब्द का उल्लेख नहीं है। इला और महि शब्दों का अनुवाद जहां संस्कृति, मातृभूमि किया है वहीं सरस्वती का अनुवाद मातृभाषा किया गया है। मातृभाषा का जो वैश्विक भाव है उसके तहत तो यह सही है मगर मातृभाषा का रिश्ता जन्मदायिनी माता के स्थूल रूप से जो़ड़ने के आग्रही यह साबित नहीं कर पाएंगे कि सरस्वती का अर्थ मातृभाषा कैसे हो सकता है? यहां सरस्वती शब्द से अभिप्राय सिर्फ वाक् शक्ति से है, भाषा से है। गौरतलब है कि वैदिकी भाषा, जिसमें वेद लिखे गए, अपने समय की प्रमख भाषा थी। सुविधा के लिए उसे संस्कृत कह सकते हैं, मगर वह संस्कृत नही थी। वैदिकी अथवा छांदस सामान्य सम्पर्क भाषा कभी नहीं रहीँ। विद्वानों का मानना है कि वेदकालीन भारत में निश्चित ही कई तरह की प्राकृतें प्रचलित थीं जो अलग अलग “जन” (जनपदीय व्यवस्था) में प्रचलित थीं। आज की बांग्ला, मराठी, मैथिली, अवधी जैसी बोलियां इन्हीं प्राकृतों से विकसित हुई। तात्पर्य यही कि ये विभिन्न पाकृतें ही अपने अपने परिवेश में मातृभाषा का दर्जा रखती होंगी और विभिन्न जनसमूहों में बोली जाने वाली इन्ही भाषाओं के बारे में उक्त सूक्त में सरस्वती शब्द का उल्लेख आया है। मेरा स्पष्ट मत है कि मातृभाषा में मातृशब्द से अभिप्राय उस परिवेश, स्थान, समूह में बोली जाने वाली भाषा से है जिसमें रहकर कोई भी व्यक्ति अपने बाल्यकाल में दुनिया के सम्पर्क में आता है। मातृभाषा शब्द मदरटंग mother tongue का अनुवाद है और मदरटंग के बारे में विकीपीडिया पर जो आलेख है, वह क्या कहता है, ज़रा देखें-
NANNYSTOCKhires The term "mother tongue" should not be interpreted to mean that it is the language of one's mother. In some paternal societies, the wife moves in with the husband and thus may have a different first language, or dialect, than the local language of the husband. Yet their children usually only speak their local language. Only a few will learn to speak their mothers' languages like natives. Mother in this context probably originated from the definition of mother as source, or origin; as in mother-country or -land. (सूत्र).
एक अन्य संदर्भ देखे-
In the wording of the question on mother tongue, the expression "at home" was added to specify the context in which the individual learned the language. (सूत्र).
जाहिर है कि मातृभाषा से तात्पर्य उस भाषा से कतई नहीं है जिसे जन्मदायिनी मां बोलती रही है। अकेली मां बच्चे के परिवेश के लिए उत्तरदायी नहीं है और न ही जन्म के लिए। सिर्फ मां की भाषा को मातृभाषा से जोड़ना एक किस्म की ज्यादती है, सामाजिक व्यवस्था के साथ भी। भारत समेत ज्यादातर सभ्यताओं में भी, कोई स्त्री, विवाहोपरांत ही बच्चे को जन्म देती है। बच्चे की भाषा के लिए अगर सिर्फ मां ही उत्तरदायी मान ली जाए, तब अलग-अलग भाषिक पृष्टभूमि वाले दम्पतियों में बच्चे की भाषा मातृपरिवार की होगी और बच्चे को वह भाषा सीखने के लिए माता का परिवेश ही मिलना भी चाहिए। मातृसत्ताक व्यवस्थाओं में यह संभव है, मगर पितृसत्ताक व्यवस्था में यह कैसे संभव होगा? यह मानना कि प्रत्‍येक को अपनी मातृभाषा सिर्फ मां से ही मिलती है, मातृभाषा शब्द का आसान मगर कमजोर निष्कर्ष है और वैश्विक संदर्भ इसे अमान्य करते हैं। एक बच्चा मां की कोख से जन्म जरूर लेता है, मगर मातृकुल के भाषायी परिवेश में नहीं, बल्कि मां ने जिस समूह में उसे जन्म दिया है. उसी परिवेश की भाषा से उसका रिश्ता होता है। इस मामले में नारी मुक्ति या पुरुष प्रधानता वाली भावुकता भी बेमानी है। मातृसत्ताक और पितृसत्ताक के दायरे से बाहर आकर देखें तो भी बच्चे का शैशव जहां बीतता है, उस माहौल मे ही जननि भाव है। जिस परिवेश में वह गढ़ा जा रहा है, जिस भाषा के माध्यम से वह अन्य भाषाएं सीख रहा है, जहां विकसित-पल्लवित हो रहा है, वही महत्वपूर्ण है। यही उसका मातृ-परिवेश कहलाएगा। माँ के स्थूल अर्थ या रूप से इसकी रिश्तेदारी खोजना फिजूल होगा।
-जारी

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Thursday, November 5, 2009

कारवां में वैन और सराय की तलाश[आश्रय-20]

caravan camel कारवां के प्रचलित अर्थों में एक अर्थ पशुओं का रेवड़ या ऊंटों की कतार भी है।
फा रसी में कारवां सराय शब्द भी इस्तेमाल होता है जिसका मतलब है राजमार्गों पर बने विश्रामस्थल। प्राचीनकाल से ही राहगीरों की सुविधा के लिए शासन की तरफ से प्रमुख मार्गों पर विश्रामस्थल बनवाए जाते थे जहां कुछ समय सुस्ताने के बाद राहगीर आगे का सफर तय करते थे। गौरतलब है कि पुराने ज़माने में अधिकांश यात्राएं पैदल या घोड़ों की पीठ पर तय की जाती थीं। कालांतर मे इनका स्थान बैलगाड़ियों ने ले लिया, मगर तब भी अवाम का एक बड़ा वर्ग पैदल ही मंजिलें तय करता था, जो बड़ा तकलीफदेह होता था। लंबी दूरियों का सफर सराय या धर्मशालाओं के बिना तय करना कल्पना से भी परे था। अकेले यात्रा करना खतरे से खाली नहीं होता था इसीलिए यात्राएं आमतौर पर सामूहिक रूप से होती थीं जिन्हें फारसी में कारवां कहते हैं। कहने की ज़रूरत नहीं कि समूह अपनेआप में एक आश्रय है। यकीनन समूह ही मानव विकासक्रम का पहला आदिम आश्रय है जो ज्यादातर जीवधारियों का चरित्र भी है। हिन्दी में भी कारवां शब्द खूब प्रचलित है। कारवां सराय caravan saray शब्द से जाहिर है कि मुस्लिम शासनकाल में भी यही व्यवस्था कायम रही। भारत में शेरशाह सूरी को इस बात का श्रेय जाता है कि उसने व्यापारिक और सैन्य गतिविधियों के विस्तार के लिए व्यवस्थित मार्गों की ज़रूरत को समझा। ग्रांड ट्रंक रोड के निर्माण का श्रेय शेरशाह  को ही जाता है जो सैकड़ों सालों से पश्चिमोत्तर के हिन्दुकुश क्षेत्र और सुदूर बंगाल की खाड़ी को जोड़नेवाला महामार्ग रहा है।
यूं कारवां शब्द अरबी में भी चलता है मगर यह इंडो-ईरानी मूल का शब्द है और बरास्ता फारसी, यह दुनिया भर की भाषाओं में प्रचलित हुआ। कारवां के विभिन्न रूप प्रचलित हैं जैसे अंग्रेजी में यह कैरवैन caravan है। डच में यह कारवान है तो जर्मन और डेनिश में कारवाने, फ्रैंच में कैरवन है तो तुर्की में इसका रूप कुछ-कुछ क्यारवाँ जैसा है। संस्कृत में कार्पटिक शब्द है जिसका मतलब है तीर्थयात्रियो का दल, व्यापारिक समूह, साधु-सन्यासियों का जत्था या सामान्य यात्रियों का काफिला आदि। हिन्दी शब्दसागर के अनुसार कार्पटिक के निम्न अर्थ हैं-

कार्पटिक-संज्ञा पुं० (सं०) १. तीर्थयात्री २. पवित्र तीर्थजल ले जाकर जीविका प्राप्त करने वाला व्यक्ति। ३. तीर्थयात्रियों का सार्थ या कारवाँ। ४. अनुभवी व्यक्ति। ५. परपिंडोपजीवी। ६. धूर्त। वंचक। ७. विश्वासपात्र। अनुगामी (को०)।

कार्पटिक का ही ईरानी रूप कारवां हुआ होगा, ऐसा लगता है क्योंकि इसकी मूल धातु कृ की कारगुजारियां इसमें साफ नज़र आ रही हैं। विभिन्न संदर्भों में कारवां का विकल्प कार्पटिक ही बताया गया है। कार्पटिक बना है संस्कृत के कर्पटः से जिसका अर्थ है चिथड़ा, गुदड़ा, लत्ता, जर्जर-मलिन वस्त्र आदि। दोनों ही बने हैं कृ धातु से। यह वही कृ धातु है जिससे संस्कृत हिन्दी में कई तरह के शब्द बने हैं। कृ का मतलब होता है करना, निर्माण करना, बनाना, रचना, धारण करना, पहनना, ग्रहण करना आदि। कर्पासः (कपास, रुई) का मूल भी यही धातु है। रुई की धुनाई, कताई, सुताई से लेकर कपड़ा बनाने और फिर वस्त्र निर्माण सम्पन्न होने से लेकर उसे धारण करने तक की क्रियाओं में ये सभी अर्थ स्पष्ट हो रहे हैं। मलिन, अस्तव्यस्त, क्लांत जैसे लक्षण आज भी यात्रियों की आम पहचान  हैं, तब सैकड़ों साल पहले की दुर्गम पदयात्राओं की कल्पना करें तो आसानी से चिथड़े धारण करनेवालों को कार्पटिक कहने की वजह समझ में आ जाती है, क्योंकि लम्बी पदयात्रा के चलते वस्त्रों की यह गत बननी स्वाभाविक थी। तीर्थ-यात्री तो यूं भी चीवर धारण कर ही सफर पर निकलते थे।
व्यापार व्यवसाय के लिए क्रय-विक्रय शब्दों के मूल में भी यही कृ धातु है। कृ से बने कृयाणम् का भाव व्यापार कर्म करनेवाले से है। हिन्दी का
तरह तरह के यानः वैन-कैरवैनag360_caravan_frt caravan2PA2307_468x295 caravan-2 karavan_02 karavan_05 21_48_2---Caravan_web
किरानी शब्द इसी मूल का है। फारसी-अरबी के कारोबार शब्द के मूल में भी कृ धातु की छाया साफ दिख रही है। जाहिर है कारोबारी काफिले के तौर पर भी कारवां का पुख्ता अर्थ इसी धातुमूल से  उपजा है।
फारसी में जाकर कार्पटिक का समूह अर्थ प्रमुख हो गया। कार्पटिक का अर्थ हिन्दी शब्द सागर में अनुगामी भी बताया गया है। अनुगमन में एक के पीछे एक चलने का भाव है जो सीधे-सीधे कारवां के चरित्र से मेल खाता है। कारवां शब्द अंग्रेजी में कैरवान/कैरवैन बन कर दाखिल हुआ जो कई अर्थों में इस्तेमाल होता है मसलन रेगिस्तान में सफर करनेवाले यात्रियों का काफिल, पशुओं का रेवड़, बहुत से वाहनों का समूह। चूंकि कारवां के साथ पदयात्रा के बावजूद बैलगाड़ी, घोड़ागाडी या ऊंटगाड़ियां चलती रही हैं इसलिए अंग्रेजी में इसका अर्थएक विशाल पर्यटन वाहन भी है। गौरतलब है कि पर्यटन वाहन अथवा बडे यात्री वाहन के लिए अग्रेजी का वैन van शब्द इसी कैरवैन शब्द का संक्षिप्त रूप है जिसे हिन्दी में भी वैन कहा जाता है। पश्चिमी जगत में कैरवैन का बहुत प्रचलन है। पूर्वी योरप के जिप्सी अपनी पूरी गृहस्थी ही इन बड़ी-बड़ी गाड़ियों में बसा कर पीढ़ियों के घुमंतूपन को ज़िंदा रखे हैं। कैरवैन में रहने की सनक ऐसी है कि बरसों से यायावरी छोड़ दी, पर गाडियों में ही रह रहे हैं। यह बहुत कुछ भारतीय सड़कों के हाशियों पर बरसों से बसे और गाड़ी में गृहस्थी चलानेवाले गाड़िया लुहारों वाला मामला है। 
प्राचीन भारत में कारवां की तर्ज पर सार्थवाह sarthvaha चलते थे। सार्थवाह अब बोलचाल की हिन्दी में लुप्त हो चुका है अलबत्ता ऐतिहासिक संदर्भों में यह अपरिचित शब्द भी नहीं हैं। ये दरअसल व्यापारिक कारवां होते थे जिनके स्वामी आज की मेट्रों सिटीज़ के  बड़े कारपोरेट घरानों की तरह तत्कालीन महानगरियों-उज्जयिनी, पाटलीपुत्र, वैशाली, काशी और तक्षशिला के श्रेष्ठिजन होते थे। सुदूर पूर्व से पश्चिम में मिस्र तक इनका कारोबार फैला हुआ था। ईसा पूर्व मिस्र में भारतीय व्यापारियों की एक बस्ती होने का भी उल्लेख मिलता है। आप्टे कोश के मुताबिक सार्थवाह का अर्थ धार्मिक श्रद्धालुओं का जत्था अर्थात तीर्थयात्री भी है। सार्थवाह बना है संस्कृत के सार्थ+वाह से। सार्थ का मतलब है समूह, झुण्ड, रेवड़, जत्था, यूथ, ग्रुप, समाज, अनुचर, अनुगामी, मित्र, सहचर आदि। वाह शब्द संस्कृत की वह् धातु से बना है जिसमें जाना, ले जाना जैसे भाव हैं। बहाव इससे ही बना है जिसमें गति और ले जाना स्पष्ट हो रहा है। वह् का वर्ण विपर्यय हवा हुआ जिसमें बहाव और गति है। ले जाने वाले कारक के तौर पर वाहन शब्द का निर्माण भी वह् मूल से ही है। कम्पनी, टुकड़ी या ब्रिगेड के लिए हिन्दी में वाहिनी शब्द भी इसी मूल का है। गौर करें कि इस अर्थ में वाहिनी स्वयं ही कारवां हैं। स्पष्ट है कि सार्थवाह का अर्थ हुआ, जो समूह को अपने साथ ले जाए वह है सार्थवाह यानी कारवां। जिस तरह कारवां का अग्रेजी रूप यान के अर्थ में कैरेवान या वैन होता है उसी तरह सार्थवाह से भी यान के अर्थ में वाहन शब्द जन्मा है। हिन्दी के साथ, साथी, साथिन जैसे शब्द सार्थ का ही अपभ्रंश हैं। साथ-साथ, साथ हो लेना, साथ लगना, साथ पकड़ना, साथ छोड़ना अथवा साथ देना जैसे कई मुहावरे इसी सार्थ शब्द से निकले हैं जिसमें समूह, साझेदारी और साहचर्य की बातें उजागर हो रही हैं।
स संदर्भ में खान, खाना या खानक़ाह शब्दों का उल्लेख भी ज़रूरी है। ख़ान या ख़ाना जैसे शब्दों में आश्रय का भाव स्पष्ट है। यह इंडो-ईरानी मूल का शब्द है। खान या खाना व्यापारिक मार्गों पर चलनेवाले काफिलों या कारवां के यात्रियों के अस्थाई ठिकाने होते थे जिन्हें मुसाफिरखाना कहा जाता था। एक मज़बूत, एक मंजिला या बहु मंजिला इमारत  जो प्रायः आयताकार होती थी और इसकी चारों भुजाओं में कई कोष्ट होते थे, जिसमें मुसाफिर ठहरते और बीच में चौरस ज़मीन का खाली टुकड़ा होता, जहां उनकी गाड़ियां, नौकर-चाकर, मवेशी आदि की व्यवस्था रहती थी। संस्कृत धातु खन् का अर्थ होता है खोदना,खुदाई करना,खुरचना या खोखला करना। खन् में भी गुफा, कंदरा या बिल का भाव है यानी यहां भी निवास है। इसी खन् का असर बजरिये अवेस्ता ईरानी में भी आया।  खाना मूलतः फौजी व्यापारिक कारवां के लोगों की विश्रामस्थली के लिए प्रयोग में आनेवाला शब्द था। बाद में अन्य शब्दों के साथ भी इसे लगाया जाने लगा जैसे बजाजखाना यानी वस्त्र भंडार, नौबतखाना यानी जहां वाद्ययंत्र बजाए जाते हैं, ज़नानखाना यानी अंतःपुर वगैरह वगैरह। खन् धातु का रिश्ता संस्कृत के खण्ड् से भी जुड़ता है जिसका मतलब है टुकड़े करना, तोड़ना, काटना, नष्ट करना आदि। यानी वही पर्वतों-पहाड़ों में आश्रय निर्माण की क्रियाएं। खण्ड् से बना खण्डः जिसका अर्थ होता है किसी भवन का हिस्सा, कमरा, अंश, अनुभाग, अध्याय आदि। किसी आलमारी या दीवार में बने आलों को भी खन या खाना कहा जाता है। बघेलखण्ड, उत्तराखण्ड, बुंदेलखण्ड, रुहेलखण्ड जैसे भौगोलिक नामों का आधार भी यही है। अर्थात संबंधित जाति या समूह का निवास या आश्रय। फारसी तुर्की में इसका रूप कंद हुआ जो समरकंद, ताशकंद, यारकंद में नज़र आ रहा है।

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Wednesday, November 4, 2009

सराए-फ़ानी का मुकाम [आश्रय-19]

पिछली कड़ियां-जड़ता है मन्दिर में [आश्रय-18] मंडी, महिमामंडन और महामंडलेश्वर [आश्रय-17] गंज-नामा और गंजहे [आश्रय-16]

रि हाइशी ठिकानों के लिए प्रयुक्त हिन्दी शब्दों में सराय लफ्ज का भी शुमार है। हालांकि सराय शब्द में स्थायित्व का भाव नहीं है बल्कि अस्थायी निवास के तौर पर ही इसका इस्तेमाल होता है।  सराय शब्द का सही सही मतलब होता है धर्मशाला, लॉज या विश्रामगृह जहां यात्रा के दौरान मुसाफिर थोड़े या सम्बे समय तक डेरा डालते हैं। सराय शब्द की आमद हिन्दी में फारसी से हुई है मगर यह इंडो-ईरानी भाषा परिवार का शब्द है और संस्कृत से इसकी गहरी रिश्तेदारी है। सराय शब्द का विस्तार दुनिया की कई भाषाओं में अलग-अलग रूपों में हुआ है और इनका अर्थविस्तार भी होता रहा है।

राय शब्द में मूलतः आश्रय का भाव है। ईरानी संस्कृति में सराय की अर्थवत्ता में महल भी शामिल है। मुस्लिम शासन के दौरान सराय शब्द का इस्तेमाल उत्तर भारत में खूब बढ़ा। सराय के धर्मशाला वाले अर्थ में इसका खूब विस्तार हुआ। देश भर में कई आबादियां बिखरी पड़ी हैं जिनके नाम के साथ-साथ सराय शब्द लगाता है। मुगलों के पड़ाव या डेरे के तौर पर बसी आबादी को मुगलसराय नाम से जाना जाता है। जाहिर है कभी यहां सराय नाम की इमारत ज़रूर रही होगी। शेख़ सराय, बेर सराय, सराय मीरां जैसे नामों के साथ दर्जनों अन्य नाम भी गिनाए जा सकते हैं। दिल्ली के पास सराय रोहिल्ला स्टेशन है। नाम से जाहिर  है कभी यहां रुहेले पठानों ने डेरा डाला होगा। आज का रुहेलखंड इन्ही रुहेलों के नाम पर  है।  यही नहीं, दक्षिण पूर्वी यूरोप के एक देश बोस्निया की राजधानी सराजेवो का नाम भी इसी सराय से निकला है। सराजेवो बना है सराय-ओवेसी से जिसका संक्षिप्त देशी रूप हुआ सराजेवो। गौरतलब है कि पूर्वी यूरोप का रिश्ता तुर्की से रहा है। फारसी से सराय शब्द तुर्की ज़बान में रच-बस गया और वहां से यह यूरोप में भी गया। बोस्निया में मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक है और वहां मिली जुली संस्कृति है। सराय के मायने वहां गवर्नर हाऊस या महल ही रहा। सराय-ओवेसी का मतलब महल के इर्द-गिर्द बसी बस्ती से है।

राय के आश्रय वाले अर्थ पर गौर करें। आश्रय मूलतः मनुष्य को सुरक्षा प्रदान करता है। संस्कृत में एक धातु है त्रा जिसमें परिरक्षण, संरक्षण , बचाव का भाव है। आर्यभाषा परिवार की एक शाखा है इडो-इरानी। अवेस्ता इसकी प्रमुख भाषा रही है जिसकी प्राचीन वैदिकी से आश्चर्यजनक साम्यता है। संस्कृत की त्रा धातु से ही संस्कृत-हिन्दी में कई शब्द बने हैं। त्राता का मतलब होता है संरक्षण करनेवाला यानी ईश्वर, प्रभावशाली व्यक्ति। तारणहार भी इसी मूल से निकला है जिसका अर्थ होता है कष्टों से बचानेवाला। इसी तरह त्राण, परित्राण, तारक जैसे शब्द भी इसी सिलसिले की कड़ी हैं। त्रा का ही एक रूप अवेस्ता में थ्रायेन्ति thrayeinti मिलता है जिसका मतलब है- वे संरक्षण करते हैं । ईरानी में इसका रूप हुआ थ्राया thraya अर्थात संरक्षण, सुरक्षा आदि। प्राचीन फारसी में इसका रूप सरा(इ) हुआ जिसका अर्थ था सुरक्षित ठिकाना, महल, भवन आदि। हिन्दी , उर्दू व अन्य कई भारतीय भाषाओं में इसका उच्चारण सराय की तरह होता है। सराय शब्द का विस्तार यूरोप के पश्चिमी छोर की स्पैनी और इतालवी ज़बानों में भी हुआ है जिसका रूप है सेरैग्लियो seraglio जिसका मतलब है विशाल राजनिवास या सुल्तान का हरम, रनिवास जहां उसकी रानियां रहती हैं। सेरैग्लियो बना है लैटिन के देशज शब्द सेरेकुलम से जिसका मतलब होता है अहाता या बाड़ से घिरा हुआ स्थान। समझा जाता है कि लैटिन में यह फारसी से, बरास्ता तुर्की पहुंचा है। सराय का फारसी रूप होता है सरा जिसका मतलब भी महल, राजभवन या पैलेस ही होता है। सरा शब्द का इन अर्थो में प्रयोग उर्दू फारसी के महलसरा, हरमसरा जैसे शब्दो मे साफ समझ में आता है। दार्शनिक अर्थों में फारसी में नश्वर शरीर, मृत्युलोक या संसार को सराए-फ़ानी कहा जाता है क्योंकि आखिरकार इसे फ़ना यानि नष्ट हो जाना है। सरा में मुसाफिरखाना या यात्रीनिवास जैसे अर्थ भी इसमें शामिल हैं।

राय से मिलता जुलता एक शब्द हिन्दी में खूब प्रचलित है आसरा जो बना आश्रय से ही है मगर जिसमें भरोसा, सहारा, निर्भरता जैसे भाव आ गए हैं जो अंततः सुरक्षा-अवलम्ब के ही रूप हैं। आश्रय शब्द बना है संस्कृत की श्रि धातु से जिसमें सहारा लेना, बचाव के लिए पहुंचना, बसना, निवास करना, चिपकना, सटना जैसे भाव है जो अंततः संरक्षण के भाव से जुड़ते हैं। श्रि में क्त प्रत्यय लगने से बना श्रित जिसका अर्थ हुआ समाया हुआ अथवा शरण में आया हुआ। इसमें उपसर्ग लगने से बनता है आश्रित अर्थात रक्षित, निर्भर, निवासी आदि। इसी तरह शरण भी हिन्दी का जाना-पहचाना शब्द है। यह बना है शरणम् से। शरणस्थल यानी सुरक्षित स्थान जो शरण+स्थल से बना है। शरणम् शब्द में मूलतः सुरक्षित स्थान का भाव है। यह बना है शृ धातु से जिसमें खोदने, टुकड़े टुकड़े करने, क्षति पहुंचाने का भाव है। जाहिर है प्राचीन कंदराओं, गुफाओं की निर्माण प्रक्रिया इस धातु में समायी है जब मनुष्य ने अपने प्रारम्भिक आवास बनाए थे। शृ धातु से बने शरण शब्द का अर्थ हुआ सुरक्षित कक्ष, आवास, देवालय, ओट या सहारा आदि।

श्रंखला की अन्य कड़ियां-1.किले की कलई खुल गई.2.कोठी में समाएगा कुटुम्ब!3.कक्षा, कोख और मुसाफिरखाना.4.किलेबंदी से खेमेबंदी तक.5.उत्तराखण्ड से समरकंद तक.6.बस्ती थी बाजार हो गई.7.किस्सा चावड़ी बाजार का.8.मुंबईया चाल का जायज़ा.9.अंडरवर्ल्ड की धर्मशाला बनी चाल [आश्रय-9].10.चाल, शालीनता और नर्क [आश्रय-10]

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Tuesday, November 3, 2009

चूजों को लगे पंख [बकलमखुद-113]

पिछली कड़ी-कभी धूप, कभी छाँव [बकलमखुद-112]

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12]दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,  आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने dinesh rसहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के सोलहवें पड़ाव और 113वें सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।
बे टी वनस्थली विद्यापीठ गई उसी साल बेटे ने उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी की थी। उस के अपने भविष्य के लिए मार्ग चुनने का अवसर आ चुका था। सरदार के सुझाव पर उस ने राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में प्रवेश परीक्षा दी, लेकिन सफलता नहीं मिली। इंजीनियरिंग में प्रवेश परीक्षा की सफलता भी इच्छित शाखा प्राप्ति के लिए पर्याप्त नहीं थी। कोटा की रवायत के मुताबिक उसे भी सुझाव मिले कि वह एक वर्ष कोचिंग ले कर आईआईटी या इंजीनियरिंग में प्रवेश के लिए यत्न करे। लेकिन बेटा इस के लिए अपना साल बरबाद करने को तैयार था, उस ने बीएससी आईटी में प्रवेश ले लिया। अब दोनों संताने अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही थीं। खर्चे बढ़ चुके थे, कोई बचत नहीं थी, ऊपर से मकान और कार ऋणों की किस्तें देनी पड़ती थीं।
आप उन्हें क्या देते थे ? 
ब कुछ अपने दम-खम पर ही करना था। अब तक एलआईसी और एक जनरल बीमा कंपनी उस के स्थाई मुवक्किल थे जो उसे लगातार अच्छा काम दे रहे थे। उसे विश्वास था कि वह अपने काम में और विस्तार कर सकेगा। उन्हीं दिनों जनरल बीमा कंपनी के डीएम का तबादला हो गया। नया डीएम आया तो लोगों ने कहा उस की मिजाजपुर्सी की जाए। कंपनी के कर्मचारियों के बहुत कहने पर वह एक दिन नए डीएम से मिल भी आया। जब काम वितरण का अवसर आया तो उसे काम भी मिला। सरदार को किसी मुकदमे के सिलसिले में डीएम ने बुलाया। केस पर बात करने में उस ने कोई रुचि नहीं ली और पूछ बैठा –आप पुराने डीएम को क्या देते थे?
उसूल पर फिर अटकी गाड़ी
रदार के लिए यह प्रश्न बहुत अप्रत्याशित था। उस ने सुना तो बहुत था कि फीस में से कमीशन देने वाले वकीलों को अधिक काम मिलता है। लेकिन उसे इस का कभी अनुभव नहीं था। एक दो कंपनियों के अधिकारियों ने उसे काम देने के लिए इस तरह का प्रस्ताव किया था। लेकिन उस ने इन कंपनियों की और फिर रुख न किया। उस ने अपने काम की गुणवत्ता पर ही काम प्राप्त करना जारी रखा था। सरदार ने नए डीएम को जवाब दिया कि हम तो काम कर के देते हैं, और पूरी फीस लेते हैं। उस दिन के बाद सरदार को कंपनी से काम मिलना बंद हो गया। यह बहुत बड़ा झटका था। उस की आय का 25% इसी कंपनी से था। कुछ दिन बाद डीएम काम में नुक्स निकालने लगा। जब भी बात करता कंपनी के सभी कर्मचारियों और दूसरे प्रोफेशनल्स को गली के स्तर की गालियाँ देता रहता। उसे सहन करना कठिन हो गया था। एक दिन सरदार के मुहँ से निकल गया, आप जिस काम में समझते नहीं उस में नुक्स निकालते हैं और काम देते नहीं। डीएम अपनी पर आ गया। गालियाँ देते हुए चेंबर से निकल कर कर्मचारियों के हॉल में आ गया। सरदार को अपमान बर्दाश्त न हुआ। उस ने वहीं डीएम को डपटना आरंभ कर दिया। यदि अपने पेशे का ख्याल न होता तो वह उस दिन शायद उस पर हाथ भी उठा चुका होता। कर्मचारी बीच में पड़े, डीएम से सरदार की और सरदार से डीएंम की तारीफ करने लगे। सरदार ने कर्मचारियों को बताया कि जिस की तुम तारीफ कर रहे हो वह पीठ पीछे उन्हें रोज सौ-सौ गालियाँ देता है और सब को बेईमान बताता है। सरदार ने कंपनी जाना बंद कर दिया। उन्हीं दिनों एलआईसी की सहयोगी कंपनी एलआईसी फाईनेंस का काम बढ़ गया। जिस ने उसे कुछ राहत तो दी लेकिन यह बढ़े हुए खर्चों की पूर्ति के लिए यह राहत पर्याप्त नहीं थी।
कम्प्यूटर के कीबोर्ड से दोस्ती
दालतों में टाइपिंग का काम मेकेनिकल टाइपराइटर से कम्प्यूटरों पर जा रहा था। इन से होने वाली टाइपिंग सुंदर होती और पूरा दस्तावेज लिखा देने के बाद भी उस में सुधार का अवसर रहता। यदि खुद का कम्प्यूटर हो तो एक जैसे दस्तावेजों को टाइप करना और आसान हो जाता। यह सब देखते हुए सरदार को अपने कार्यालय में कंप्यूटर की जरूरत महसूस होने लगी थी, लेकिन खर्चे उसे लाने को रोकते। कॉलेज के दूसरे ही वर्ष में बेटे को घर पर कम्प्यूटर की जरूरत हुई तो कम्प्यूटर लाना ही पड़ा। एक पार्ट टाइम ऑपरेटर लगा लिया। बेटा कंप्यूटर को रात दस बजे के बाद ही हाथ लगाता तब तक उस पर वकालत का काम होने लगा। इस से सरदार के काम की गुणवत्ता में बहुत सुधार हुआ। उसे लगता कि यदि वह खुद टाइपिंग सीख ले तो बहुत नए प्रयोग कर सकता है। अंग्रेजी टाइपिंग तो ट्यूटर ने उसे सिखा दी, लेकिन हिन्दी तो जरूरी थी। अदालत का सारा काम तो यहाँ हिन्दी में ही है। उस के लिए किसी ने टाइपिंग ट्यूटर नहीं बताया। उस का क्या किया जाए? बहुत सोचने पर हल निकला कि मैकेनिकल के लिए जो टाइपट्यूटर पुस्तकें आती हैं उन्हीं की मदद ली जाए। उन से अपने लिए एक काम चलाऊ ट्यूटर वर्ड फाइल में बनाया और कृतिदेव फोंट में टाइप करना सीख लिया। दो माह में काम चलाऊ टाइपिंग शुरू हो गई। उस ने अपने मुंशी को भी बहुत कहा कि वह टाइपिंग सीख ले। पर उस की की समझ में यह घुसा हुआ था कि वह बयालीस की उम्र में टाइपिंग नहीं सीख सकता। वह नहीं सीख सका। उस से दस वर्ष अधिक उम्र में सरदार सीख गया।
इंटरनेट से साबका, बिल ने डराया…
स बीच इंटरनेट का महत्व समझ में आने लगा था। सुप्रीमकोर्ट और कुछ हाईकोर्टों के निर्णय दूसरे ही दिन डाउनलोड के लिए उपलब्ध होने लगे थे। सोच बनने लगी कि नेट कनेक्शन ले ही लिया जाए। नगर में ब्रॉडबैंड सेवा आरंभ हुई तो बेटा कहने लगा कनेक्शन के लिए आवेदन कर दिया जाए। सरदार तो स्वयं भी यही चाहता था। कनेक्शन के लिए आवेदन किया और सप्ताह भर में कनेक्शन लग गया। एक नई दुनिया उस के कार्यालय में पहुँच चुकी थी। इसे देखा तो ऐसा लगा जैसे दूसरी दुनिया में पहुँच गए हों। हुआ भी यही, जब पहला बिल आया तो उस ने वास्तव में दूसरी दुनिया दिखा दी। सरदार समझा ही नहीं था कि डाउनलोड-अपलोड में क्या-क्या शामिल है? साढ़े तीन हजार से अधिक के इस बिल ने समझा दिया था कि जो कुछ भी हम संकेत भेजते हैं और जो भी संकेत हमें प्राप्त होते हैं सभी इस में सम्मिलित हैं। उस के बाद कनेक्शन कुछ नियंत्रित हुआ। स बीच बेटी गणितीय विज्ञान में सांख्यिकी के साथ स्नातकोत्तर हो गई और उस ने आगे अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए जनसंख्या विज्ञान के अंतर्राष्ट्रीय संस्थान में जनसंख्या विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि के लिए आवेदन किया और प्रवेश पा लिया। वह मुम्बई पहुँच गई। इसी वर्ष बेटा भी स्नातक हो गया था वह पहले ही तय कर चुका था कि वह इंदौर से एमसीए करेगा। चूजों के पंख लग चुके थे वे जनक-जननी को छोड़ अपने अपने जीवन पथ की उड़ान के अभ्यास पर निकल पड़े थे।

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Sunday, November 1, 2009

जड़ता है मन्दिर में [आश्रय-18]

kedarnathपिछली पोस्ट- गंज-नामा और गंजहे [आश्रय-16] मंडी, महिमामंडन और महामंडलेश्वर [आश्रय-17]

श्रय का महत्व हर किसी के लिए है। प्रकृति ने खुद ही इसकी व्यवस्था की है, बस सभी जीवधारियों ने आवश्यकता के अनुसार इसे तलाशा और बनाया है। आश्रय के अर्थ में भारतीय मनीषा में धाम शब्द का बड़ा महत्व है। धाम में ईश्वर विराजते हैं। आध्यात्मिक-धार्मिक संस्थानों के भवनों के साथ धाम शब्द का प्रयोग अधिक होता है जबकि सामान्य आवासीय स्थापत्य के लिए निवास, आवास अथवा कुटीर शब्द का इस्तेमाल होता है। धाम इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का शब्द है। प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार की dome/domu धातुओं से इसकी रिश्तेदारी है जिनका अभिप्राय निर्माण से है। अंग्रेजी के डोम dome की रिश्तेदारी मूल रूप से ग्रीक doma से है। संस्कृत धातु धा से इसकी रिश्तेदारी है जिसमें धारण करना, रखना, रहना, आश्रय जैसे भाव शामिल हैं। इसी तरह मन्दिर शब्द का महत्व भी धाम के तौर पर ही है। मनुष्य के आवास से हटकर मन्दिर ईश्वर का आवास होता है।
न्दिर शब्द का निर्माण हुआ है मंद धातु से। संस्कृत की मंद धातु की व्यापक अर्थवत्ता है। मूलतः मंद में जड़ता का भाव है। मंद यानी कुंद बुद्धि, जड़मति, धीमा, स्थिर आदि। मन्द का प्रयोग आमतौर पर मूर्ख या बुद्धू व्यक्तियों के लिए भी किया जाता है। मन्द एक विशेषण है जिसमें सुस्ती, जड़ता, ढिलाई, धीमापन, मूर्खता जैसे भाव हैं। इसके साथ ही मन्द में नशेड़ी, बीमार, आलसी, दुर्बल, कमजोर या शिथिल की अर्थवत्ता भी है। ईश्वर की महिमा के अनुरूप ही मन्दिर भी महिमा वाला शब्द है। ऐसे में इन तमाम विशेषणों की मन्दिर से रिश्तेदारी कुछ अटपटी लगती है। गौर करें मन्द में निहित जड़ता के भाव पर। जड़ता का यही भाव मन्द् से बने मन्दर में प्रमुखता से उभर रहा है जिसमें पर्वत का भाव है। पौराणिक काल के एक पर्वत को मन्दारगिरि भी कहा गया है। मन्द से मन्दार यानी पर्वत बनने के पीछे वही प्रणाली काम कर रही है जिसने अचल शब्द में पर्वत की अर्थवत्ता स्थापित की। संस्कृत-हिन्दी में अचल का अर्थ पर्वत होता है। अ+चल् यानी जो गति न करे, स्थिर रहे। पर्वत से ज्यादा जड़ और क्या हो सकता है? इसी जड़ता के भाव से जन्मा है मन्द से मन्दार यानी पर्वत। जो जड़ है, अचल है। इस तरह मन्दार यानी पर्वत पर बने आवास को कहा गया मन्दर या मन्दिर जिसमें मानव आवास का ही भाव था। प्राचीनकाल से ही मनुष्य ने पर्वतो की उपत्यकाओं में आश्रय तलाशा। शुरुआती दौर में मानव पहाड़ी कंदराओं में ही निवास करता था। पौराणिक मनीषा भी यही कहती रही है कि पर्वतों में ही देवी-देवताओं का वास रहता है। दुर्ग का अर्थ
tempपर्वत को अचल कहते हैं यानी जो चल न सके। यही भाव मन्दार में है। यानी जो मन्द हो, जड़ हो, वही है मन्दार यानी पहाड़, आलय, निवास आदि।
आज चाहे गढ़ी या किला होता है पर असल में दुर्ग का अर्थ है पहाड़ यानी जहां जाना दुर्गम हो। जहां चलना कठिन हो। देवी का नाम दुर्गा इसीलिए पड़ा क्योंकि वे पर्वतवासिनी हैं। शिव, विष्णु के धाम केदारनाथ, बद्रीनाथ पहाड़ों पर ही हैं। शिव का विलक्षण धाम कैलाश मानसरोवर अपनी ऊंचाई के लिए जगप्रसिद्ध है। किले के अर्थ में कोट शब्द भी बहुप्रचलित है, किन्तु मूल रूप से कोट का अर्थ भी पहाड़ ही होता है जो कूट धातु से बना है। चित्रकूट से आशय पर्वत का ही है। मन्द का एक अर्थ हाथी की तरह विशाल, यम अथवा शनिग्रह भी है।
स्पष्ट है कि मन्दार में सर्वप्रथम आश्रय का भाव है। मनुष्य की घुमक्कड़ी का महत्वपूर्ण पड़ाव था आवास बना कर रहना। आवास जड़ होता है। आवास नहीं चलते, मनुष्य चलता है।  घर में आकर्षण होता है जिससे मनुष्य बंधा रहता है। तरक्की में हमेशा घर ही रुकावट बनाता है क्योंकि यह जड़ होता है और जड़ बनाता है। इसलिए लिए मन्द् (जड़)धातु से से बने मन्दार या मन्दिर में आवास का भाव है तो आश्चर्य कैसा? इसी क्रम में मन्दिरम् शब्द अस्तित्व में आया। प्रारम्भिक रुप में मन्दिर का अर्थ सामान्य आवास ही था। गिरि-कंदराओं में सुरक्षित आलयों का निर्माण करने की वजह से ही पर्वतीय आश्रयों को मन्दिर कहा गया। पहाड़ी आश्रयों के स्थान पर मनुष्य ने जब मैदानों, पठारों पर निवास आरम्भ किया तब पर्वतीय कंदराओं, आलयों को देवालयों के अर्थ में मन्दिर की पृथक अर्थवत्ता मिल गई। यू मन्दिर में आवास, भवन, शिविर, नगर, बस्ती का ही भाव प्रमुख है। संस्कृत में मंदिरा भी एक शब्द है जिसका अर्थ होता है घुड़साल यानी अश्वशाला। जाहिर है आलय या आश्रय का भाव तो है ही। दिलचस्प है कि मन्द का ही पूर्व रूप था मन्थ जिसमें धीमी हलचल या शिथिल क्रिया का भाव है। मन्थन यानी बिलौना की मूल धातु यही मन्थ है। गौर करें मन्थन में द्रव को आलोड़ित करने या धीरे-धीरे उसे घुमाने का भाव ही है। मन्थर भी इसी मूल से बना है जिसमें शिथिलता, धीमापना, रुकावट जैसे भाव हैं जो मन्द् से जुड़ते हैं। मन्थर की तरह मन्दर शब्द का अर्थ भी भी धीमा, सुस्त या विलंबित होता है। स्कूली जीवन में अलंकार पढ़ते वक्त रीतिकालीन कवि भूषण को पढ़ा था-ऊंचे घोर मन्दर में रहनवारी, अब ऊंचे घोर मन्दर में रहाति है। यहां विरोधाभास की बात कही जा रही है। एक स्थान पर ऊंचे घोर मन्दर का अभिप्राय ऊंची प्रशस्त अट्टालिका से है तो दूसरे स्थान पर ऊंचे घोर मन्दर से आशय पहाड़ी कंदरा से है। दोनो स्थानों के उल्लेख से भाग्य और दुर्भाग्य की ओर इशारा किया गया है। बहरहाल यह तो स्पष्ट है कि मन्दर पहाड़ भी है, मन्दिर भी है, कंदरा भी है। संस्कृत में मन्दार नाम एक वृक्ष का भी होता है जिसे चलती हिन्दी में आक या अकउआ कहते हैं। मदार का पेड़, मन्द से ही निकला है।

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सरपत की धार पर अभय तिवारी

संबंधित आलेख-सरपत के बहाने शब्द-संधानFilm-logo-729747

भय तिवारी अपने दोस्त हैं। ब्लागर हैं। संवेदनशील हैं और फिल्मों के काम से जुड़े हैं। मुंबई में फिल्मों-धारावाहिकों में अपनी रचनात्मकता के दायरे में आत्मसम्मान की गुंजाईश देखते हुए व्यस्त रहते हैं। इस साल उनकी बनाई लघु फिल्म सरपत की चर्चा हो रही है। दिल्ली, मुंबई, पुणे, इलाहाबाद में मीडिया और रचनाकर्म से जुड़े लोगों के बीच अभय की इस कृति का सीमित प्रदर्शन हुआ और इस कोशिश को भरपूर प्रोत्साहन मिला। इस फिल्म के नाम से मैं खासा प्रभावित रहा और जब तक फिल्म देखने को मिलती, सरपत नाम को आधार बना कर इस पर दो किस्तों में शब्दों का सफर कर डाला।  अभय की यह फिल्म हमने भी पिछले दिनों तब देखी, जब उन्होंने इसकी डीवीडी भेजी। बिन मांगी इस सौगात के लिए उनका आभार।
फिल्म/थिएटर या कहें कि प्रदर्शनकारी कलाओं में अपनी दिलचस्पी रही है।  पहले बराबर नजर रखते थे, मगर बाद में अन्यान्य कारणों से यह सक्रियता कम होती चली गई। फिल्म विधा बहुत खास है और कैमरे की आंख कलम-कूची से रची गई कृति की बनिस्बत  उन आयामों को भी देख पाती है,

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चित्र-1-2-3 में अभय तिवारी शॉट समझाते हुए जिन्हें प्रमोद सिंह ने खींचा है। बाकी चित्रों में कुछ हमने वीडियो से उठाए और कुछ अभय ने उपलब्ध कराए। लोकेशन मुंबई के नजदीक देहात की है।

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जिसकी कल्पना कर हम उस कृति के गुण-दोष पर विचार कर रहे होते हैं। हिन्दुस्तान में फिल्म विधा खालिस मनोरंजन माध्यम के रूप में से स्थापित है। रचनात्मकता या सृजन के सशक्त माध्यम के रूप में इसका मूल्यांकन मुंबइया सिनेमा के दर्शक से करना हमेशा से बेमानी समझा जाता रहा है क्योंकि उनकी पसंदगी-नापसंदगी हमेशा स्पीड, एक्शन, थ्रिल, म्यूजिक, ड्रामा जैसे पैमानों से गुज़रती है। नई धारा का फिल्मकार दरअसल अपनी फिल्म को कवि और लेखक की तरह रचता है, इसलिए इसे समझने के लिए भी कविता या कहानी को समझने वाली सेन्सिबिलिटी चाहिए। अभय का काम इस नजरिये से भी खास है। इस छोटी सी फिल्म में कई बातें एक साथ स्पष्ट होती हैं और यह हमारे समाज की विभिन्न प्रवृत्तियों, अंतर्विरोधों को फ्रेम-दर-फ्रेम और संवादों के जरिये उभारती है। फिल्म की अवधि करीब अठारह मिनट है।
पूरी फिल्म में सरपत यानी तलवार से भी तेज़ घास का प्रतीक छाया हुआ है। सरपत की चुभन हर फ्रेम में महसूस हुई। संभव है ऐसा इसलिए भी हुआ हो क्योंकि मैं फिल्म को प्रतीकों के माध्यम से समझने का आदी रहा हूं। सरपत पर जब शब्दों का सफर लिख रहा था तो लगातार यह भी सोचता रहा कि अभय ने सरपत के प्रतीक का क्या और कैसा प्रयोग फिल्म में किया होगा। सो, अवचेतन में जो बात मेरे भीतर थी, उसने फिल्म में भी सरपत को तलाशा।
फिल्म में एक शहरी जोड़ा सफर पर है। कार का पहिया पंक्चर होता है। ये लोग किसी मदद की आशा में जंगल में घुसते हैं। एक खंडहर में उन्हें जिंदगी नजर आती है। देहाती औरत से साक्षात्कार होता है जिसका पति कर्ज की वजह से जान दे चुका है। गोद में नन्हे बच्चे को लिए, अपने देवर के साथ, गांव छोड़ कर इस बियाबान में आकर बस जाती है। शहरी स्त्री के पूछने पर, कि गुजारा कैसे होता है, ग्रामीण स्त्री अन्यमनस्कता से जो जवाब देती है वह उसे गहराई तक आशंकित कर जाता है। यहां है सरपत का शूल!!! तंगहाली की तकलीफ को बयां करते उस  व्यंग्य को शहरी स्त्री भांप नहीं पाती। शहरी स्त्री को गांववाली की सोहबत में  छोड़कर, उसका साथी टायर बदलने जाता है। शहरी स्त्री के भीतर आशंकाओं की खरपतवार पनपने लगती है। सरपत की चुभन यहां है। फिल्म यहां अचानक चौंकाती है। दरअसल यही नाटकीयता फिल्म माध्यम की ताकत है जो दर्शकों पर अन्य कला माध्यमों की तुलना में जादुई असर छोड़ती है।
किन्ही सहज क्षणों के साथ शुरु हुआ संवाद अचानक शहरी स्त्री को उस कल्पनालोक में पहुंचा देता है, दरअसल जो औसत शहरी मन में छाया है। यहां चाहें तो शहरी को और भी स्पेसिफिक तरीके से समझ सकते हैं। महानगरीय मानसिकता शायद वहां तक नहीं पहुंचती जहां से उस दुखी, पीड़ित स्त्री के संवाद की सचाई को महसूस कर सके। शहरी स्त्री को खंडहर में बसे उन ढाई-तीन प्राणियों से असुरक्षा का एहसास इतना गहराई तक परेशान करता है कि वह उन्हें सचमुच अपराधी के रूप में देखती है। कल्पनालोक में स्त्री का विचरण ही फिल्म की जान है। यहीं है सरपत का जंगल, यही है दो समाजों, दो परिवेशो के बीच की दूरी जिसे कभी पाटा नहीं जा सकता। यह दूरी तब भी नहीं मिटती जब इन वर्गों के किरदार एक दूसरे से रूबरू होते हैं, बल्कि तब ज़मीनी हकीक़त से दूर काल्पनिक सचाई उन्हे अनायास खींच कर फिर दूर छिटका देती है। सोच के स्तर पर जब इतनी विसंगति हो तब शहरी-ग्रामीण, अमीर-गरीब के बीच का दुराव तो बना रहेगा। अभय की फिल्म इसे बखूबी स्पष्ट करती है।
सके अतिरिक्त स्त्री विमर्श के पर्याप्त बिंदु भी फिल्म में नजर आए। ये अनायास नहीं है बल्कि समाज से गहराई से जुडे एक रचनाकार ने सायास अपने माध्यम के जरिये इन्हें देखा है। फिल्म के शुरुआती संवाद स्त्री-पुरुष रिश्तों में निहित अंतर्विरोध को उजागर करते हैं।
poster smallनिर्देशन-कथा-अभय तिवारी / कलाकार-रचना शाह. प्रशान्त नारायणनन.गरिमा श्रीवास्तव/ कैमेरा- सुधीर पलसाने/ ध्वनि मुद्रण-शेरखान.मनोज सिक्का/ विशेष सहयोग-प्रमोद सिंह यह लघु फ़िल्म मँगाने के लिए इस पते पर लिखें: मैजिक लैन्टर्न फ़ाउन्डेशन, जे १८८१, चित्तरंजन पार्क, नई दिल्ली – १९; फोन: ११ ४१६०५२३९, ईमेल: underconstruction@ magiclanternfoundation.org
पुरुषवादी मानसिकता कब, कहां, कैसा असर हमारे रिश्तों पर रोज़ छोड़ती है, फिल्म के शुरुआती फ्रेमों में यह बखूबी उजागर हुआ है। कुल मिलाकर मैं इस फिल्म से बहुत प्रभावित हुआ हूं। फिल्म के किरदारों का वर्गीकरण सामान्य नायक-नायिका वाले दायरे में नहीं किया जा सकता। दोनो स्त्री पात्र ही फिल्म के मुख्य चरित्र हैं। शहरी स्त्री और देहाती स्त्री की भूमिका निभाई है क्रमशः गरिमा श्रीवास्तव और रचना शाह ने। दोनों कलाकारों ने बेहतरीन काम किया है।  ग्रामीण स्त्री का चरित्र थोड़ा नाटकीय है इसीलिए उसमें चुनौती ज्यादा थी। शहरी स्त्री का किरदार एकदम सहज था और रचना शाह ने बेहतरीन तरीके से उसे निभाया। फिल्म की फोटोग्राफी शानदार है। ध्वन्यांकन उत्तम है।
भय तो वैसे भी जबर्दस्त प्रतिभावान हैं। हम उम्मीद रखते हैं कि आगे भी वे इस माध्यम पर भरपूर आज़माईश करेंगे। सिनेमा बहुत समय खपाऊ, महंगा माध्यम है। लघु फिल्मों की लागत भी लाखों में आती है, वह भी तब जब मित्रों और संबंधों का भरपूर सहयोग मिले। इच्छा थी कि इलाहाबाद में उनसे गले मिलकर बधाई देते, पर वह न हुआ। उन्हें जीवन भर निर्मल आनंद मिले, मंगल कामना है। हमें अच्छा लगा कि यह फिल्म इलाहाबाद के ब्लागर सेमिनार में दिखाई गई, हालांकि वहां हम इसे नहीं देख पाए। जिन साथियों ने इसे वहां देखा है उनसे अनुरोध है कि इस पर ज़रूर कुछ लिखें।  मेहनती और रचनात्मक प्रयासों का उल्लेख हमेशा होना चाहिए, देर से सही।

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Saturday, October 31, 2009

कभी धूप, कभी छाँव [बकलमखुद-112]

पिछली कड़ी-घर-शहर की बदलती सूरत [बकलम खुद-111]

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12]दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,  आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने dinesh rसहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के सोलहवें पड़ाव और 112वें सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।
गर के वातावरण के बदलाव ने सरदार के व्यवसाय को प्रभावित करना आरंभ कर दिया था। एक वक्त था जब औद्योगिक विवादों और उन से संबंधित मुकदमों की इतनी भरमार थी कि एक बार श्रम न्यायालय में प्रवेश के उपरांत उसे समय ही नहीं मिलता था। जिस के परिणाम स्वरूप उस ने अपने सभी अपराधिक और दीवानी मुकदमों को दूसरे वकीलों को देना पड़ा था। एक औद्योगिक और श्रंम मामलों के वकील के रूप में उस की पहचान बन चुकी थी। दाल-रोटी के अलावा भी कुछ बचने लगा था। जिस ने यह संभव बनाया कि सरदार और छोटा भाई सुनील मिल कर तीसरे भाई अनिल का विवाह समाज में अपने पिता और परिवार की प्रतिष्ठा के अनुरूप संपन्न कर सके। पिता की जिम्मेदारियों में अभी एक छोटे भाई को ब्याहना और शेष था।
श्रम न्यायालय सीधे राज्य सरकार के अधीन था और इस में जज न्यायपालिका से आते थे। नए जजों की कमी का सीधा असर इस पर पड़ा। एक जज का स्थानांतरण होता तो दूसरे जज की पदस्थापना में समय लगता। बद स्थापना हो जाने पर भी जब तक जज के नाम से अधिसूचना गजट में प्रकाशित न हो वह काम करने में असमर्थ रहता। सरकार का काम इतना सुस्त कि अधिसूचना के प्रकाशन में ही तीन-तीन माह निकल जाते। इस तरह कभी छह माह, कभी साल भर और कभी-कभी दो-दो साल तक श्रम न्यायालय खाली रहने लगा। वहाँ लंबित मुकदमों की संख्या बढ़ने लगीं। पहले जिस मुकदमे में माह में दो बार पेशी हो जाती थी, अब उसी में चार और छह माह में एक पेशी होने लगी। मुकदमा जो दो से तीन साल में निर्णीत हो जाता था उसे निर्णीत होने में दस से पन्द्रह साल लगने लगे। इधर नगर के पुराने उद्योग बंद हो रहे थे और नए लग नहीं रहे थे। बड़ी संख्या में हुई छंटनी ने मजदूरों को मालिकों की शर्तों पर काम करने, यहाँ तक कि कानूनी बाध्यताओं से भी कम वेतन और सुविधाओँ पर काम करने पर बाध्य कर दिया था। नगर में श्रमिक आंदोलन कमजोर पड़ जाने से श्रम विभाग ने श्रम कानूनों की पालना कराने में ढिलाई बरतनी आरंभ कर दी।
गर में जहां न्यूनतम वेतन से कम पर किसी को काम पर रखना असंभव था। न्यूनतम मजदूरी से कम पर श्रमिकों से काम लिया जाने लगा। कानूनी रूप से ओवरटाइम की दर दुगनी देना बाध्यकारी होने पर भी श्रमिक सामान्य दर पर काम करने को बाध्य हो गए। नए औद्योगिक मुकदमों की संख्या कम होने की आहट आ रही थी। इन परिस्थितियों में सरदार को लगने लगा कि यदि अपने काम को केवल श्रम और औद्योगिक कानूनों तक ही सीमित रखा तो दाल-रोटी भी खटाई में पड़ सकते हैं। उस ने फिर से दीवानी, फौजदारी और विविध कानूनों से संबंधित मुकदमों का काम करना आरंभ कर दिया। यह सफर आसान नहीं था। दीवानी विधि में कानूनों की भरमार थी। हर नया मुकदमा नयी चुनौतियाँ ले कर सामने आता। हर नए मुकदमे के लिए कानून को नए सिरे से समझना पडता। लगातार अध्ययन बहुत आवश्यक था। यह सब कम चुनौतियों से भरा नहीं था। अब सरदार का समय इस अध्ययन में लगने लगा और पैसा किताबों और दूसरी सामग्री जुटाने में। लेकिन श्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता। अनवरत श्रम ने नए प्रकार के मुकदमों में सफलता दिलायी और यह काम फिर चल निकला।
च्चे उम्र और पढ़ाई के उस मुकाम पर पहुँच गए थे कि घर छोटा पड़ने लगा था। घर का भूतल पूरा निर्माण कराना जरूरी हो गया था। एक-दो मुकदमों में अच्छी फीस मिली तो घर विस्तार आरंभ कर दिया। वह पूरा हुआ तब पता लगा कि बाजार का कर्ज हो गया है। फिर एलआईसी काम आई। उस से कर्ज ले कर भार उतारा। परेशानी कुछ कम हुई। एक मित्र का मुकदमा लड़ा था। कोटा के बाहर जाना पड़ता था। उन्हें अच्छी खासी रकम मुआवजे में मिली। वे फीस देना चाहते थे। एक दिन पीछे लग गए। कार खरीदनी है। शोरूम ले गए। बैंक से कार फाइनेंस कराई, मार्जिन खुद दिया, कार सरदार के घर पहुँच कर खड़ी हो गई। अब कार चलाना सीखना था। लोगों ने इंस्टीट्यूट जाने का सुझाव दिया। पर सरदार एक टैक्सी ऑनर मित्र को लेकर सीखने निकला। पहले ही दिन 60-62 किलोमीटर गाड़ी चलवा दी। उस से अगले रविवार एक जूनियर को ले कर निकला तो इतनी ही और चला ली। वापस लौटे ही थे कि टैक्सी ऑनर मित्र भी आ गए। उन्हों ने भी इतनी ही चलवाई। कार फिर भी घर ही खड़ी रही। एक मित्र को कहा –मैं तकरीबन पोने दौ सौ किलोमीटर अभ्यास कर चुका हूँ, जरा जाँचिए तो सही कितना सीखा है? अगले रविवार उन्हों ने परीक्षा ली, शहर में ही तीस किलोमीटर कार चलवा दी और कह दिया कल से अदालत ले कर जाओ। सरदार अगले दिन कार लेकर निकला तो एक ऑटोरिक्षा बंपर को पिचका कर निकल गया। छोटी-मोटी दुर्घटनाएँ बाद में भी हुईं पर हमेशा गलती औरों की होती। कई बार लोगों ने गलती करते हुए कार ठोकने की कोशिश की, लेकिन अपनी कोशिशों से सरदार बच गया। अब तो हालत यह है कि वह यह सोच कर वाहन चलाता है कि सड़क पर सब उसी को ठोकने निकले हैं और उसे खुद को बचाते हुए अपना वाहन चलाना है।
जीवन ठीक चल रहा था कि परिस्थितियों ने अचानक फिर बड़ा आघात दिया। एक सड़क दुर्घटना ने छोटे भाई सुनील को लील लिया। उस ने परिवार को ऐसा संभाला था कि सरदार उस ओर से पूरी तरह निश्चिंत हो चला था। उस का सार्वजनिक कामों का दायरा इतना विस्तृत था की बारां नगर का कोई भी सामाजिक काम उस से अछूता नहीं रह गया था। सरदार जब बारां पहुंचा तो पूरा नगर शोक में डूबा था, बाजार पूरी तरह बंद। वह प्राइमरी का मास्टर था, लेकिन उस के काम ने उसे आम लोगों के बीच इतना बड़ा बना दिया था कि उस की उपेक्षा असंभव थी। क्षेत्र के विधायक, सांसद, मंत्री और सभी राजनैतिक लोगों को उस के निधन पर शोक जताने घर आना पड़ा था। इस घटना से परिवार फिर संकट में आ खड़ा हुआ था। सुनील की पत्नी और दो बच्चे, माँ और एक अविवाहित छोटा भाई फिर से सरदार और अनिल के सहारे हो गए थे। पहले तो यह भी लगा कि सब को कोटा ही साथ ले आया जाए। लेकिन सबने तय किया कि अभी साल भर यहीँ रहेंगे। सुनील के काम के प्रभाव ने असर किया, तीन माह बीतने के पहले ही उस की पत्नी को उसी स्कूल में नियुक्ति मिल गई जहाँ वह पढ़ाता था। संकट कम हुआ। परिवार फिर से मुकाम पर आने लगा।
बेटी विज्ञान की स्नातक हो गई। वह गणित अथवा किसी तकनीकी विषय में स्नातकोत्तर होना चाहती थी। लेकिन उस ने कोटा में पढ़ने से इन्कार कर दिया। उस के लिए कॉलेज की तलाश आरंभ हो गई। वनस्थली विद्यापीठ में एमसीए और स्नातकोत्तर गणित के लिए आवेदन किया। एमसीए के लिए प्रवेश परीक्षा भी ली गई लेकिन उसे अपनी चाहत, गणित स्नातकोत्तर में प्रवेश मिल गया। उन दिनों सरदार को लगा था कि कैसे बच्चों के बाहर पढ़ने का खर्च वहन किया जा सकेगा। अब यह भी लगने लगा था कि बच्चों की पढ़ाई के इस व्यय के लिए उसे आरंभ से ही कुछ बचाना चाहिए था। फिर वह पीछे नजर दौड़ाता तो उसे दिखाई देता कि कभी ऐसा अवसर ही नहीं मिला कि वह कुछ बचत कर सकता। कभी कुछ बचने लगता भी तो अचानक हुई घटनाओं ने उसे असंभव बना दिया। लेकिन आर्थिक कारणों से बच्चों के मासूम सपनों को कत्ल तो नहीं किया जा सकता था। मित्रों ने उस में साहस पैदा किया, कि जब इतना किया है तो यह भी कर लोगे। सरदार ने इसी सोच के साथ कि कुछ भी क्यों न करना पड़े? बच्चों की पढ़ाई में वह कोई व्यवधान न आने देगा, बेटी को वनस्थली विद्यापीठ छोड़ा।

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Friday, October 30, 2009

मंडी, महिमामंडन और महामंडलेश्वर [आश्रय-17]

पिछली कड़ी-गंज-नामा और गंजहे [आश्रय-16]sri_yantra_color

चां आवासीय क्षेत्रों की पहचान आमतौर पर बाजार या कारोबारी इलाके के रूप में भी होती रही है। इनमें मंडी या मण्डी भी बहुप्रचलित नाम है। कुरावर मंडी, मंडीबामोरा, मंडी हसोद जैसे नाम तो हैं ही इसके अलावा हिमाचल प्रदेश का मण्डी शहर भी इसी कड़ी में आता है। मंडी का अर्थ आज विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के क्रय-विक्रय के विशिष्ट केंद्र के अर्थ में रूढ़ हो गया है जैसे सब्जी मंडी, धान मंडी, गल्ला मंडी, अनाज मंडी, दाल मंडी आदि। गौर करें ये सभी मंडियां इनके पहले जुड़े वस्तुनाम के बाजार के रूप में जानी जाती रही हैं, मगर साथ ही इनकी पहचान आवासीय क्षेत्र के रूप में भी रही है क्योंकि व्यापारिक केंद्रों के बस्तियों में बदलने का क्रम बहुत पुराना है और जारी है। इस कड़ी में जिस्म की मण्डी जैसे शब्द प्रयोग का उल्लेख भी होना चाहिए।
प्राचीन काल से ही आश्रय के रूप में सबसे पहले मनुष्य को छत की ज़रूरत महसूस हुई। प्राकृतिक आवास यानी वृक्षों की कोटर और पर्वतीय कंदराओं में निवास करनेवाला मनुष्य जब विकास क्रम में आगे बढ़ा तब कृषि संस्कृति की शुरुआत हुई। जाहिर था, मनुष्य को अब खुले मैदानों में अपना ठिकाना बनाना था। खुले मैदानों में आश्रय का निर्माण 3_flatiron_favorites3 अधिक कठिन था। इसमें चाहरदीवारी के साथ साथ छत की व्यवस्था भी खुद ही करनी थी। छप्पर तानने के लिए किसी आधार की जरुरत होती है। टहनियों को मोड़कर सबसे पहले मनुष्य ने छप्पर बनाने की आसान तरकीब ईजाद की। आज की तिरछी छतों का प्राचीन रूप था यह। सड़क किनारे बंजारों की झोपड़ियां इसी तकनीक से बनती हैं। कुट् धातु में टेढ़ेपन या वक्रता का भाव है। कुटिया, कुटीर इसी धातु से बने हैं। इसका अगला रूप हुआ मण्डप। एक ऐसा आच्छादन जो चार पायों पर स्थिर रहता है। मण्डप बना है मण्ड् धातु से जिसकी व्यापक अर्थवत्ता है। घेरा, वलय, दायरा से लेकर आच्छादन जैसे आश्रय के विभिन्व भाव इस धातु में निहित हैं। मूलतः मण्ड् धातु में आधार, ऊपर उठना जैसे भाव निहित हैं।
मंडी शब्द के मूल में भी यह मण्ड् धातु झांक रही है। आज जो मंडी समूहवाची शब्द है वही किसी वक्त इकाई थी। संस्कृत के मण्डपिका शब्द का अपभ्रंश है मंडी जिसका मतलब है छोटा चंदोवा, छप्पर, छाजन आदि। हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक प्राचीनकाल में व्यापारियों पर लगनेवाले बिक्रीकर को भी मण्डपिका कहा जाता था। समझा जा सकता है कि सार्वजनिक स्थान पर कारोबार करने की एवज में शासन यह शुल्क लेता होगा। मण्डप, मंडपी या मण्डपिका में सामान्य तौर पर दुकान का भाव उभर रहा है। मुगलकाल में इसे तहबाजारी कहा जाता था। स्थानीय शासन आज भी छोटे दुकानदारों या फुटपाथ पर सामान बेचनेवालों से तहबाजारी शुल्क वसूलता है। धीरे धीरे। मण्डी शब्द बड़े और संगठित बिक्री केंद्र के लिए प्रयुक्त होने लगा। संस्कृत के मण्डप शब्द का सांस्कृतिक महत्व है। लोक-संस्कृति में मण्डप शब्द का मतलब एक छायादार स्थान होता है जहां बहुत से लोग बैठ सकें। मण्डप शब्द में उत्सवधर्मिता है जो समूह से जुड़ी है। लग्नमण्डप, यज्ञमण्डप जैसे शब्दों से यह स्पष्ट है। मंदिरों के गुम्बद को भी मण्डप कहा जाता है। मण्डप भरना एक मुहावरा है जिसका मतलब किसी आयोजन की शोभा बढ़ने या उसमें लोगों की शिरकत से है। बाजार या दुकान के अर्थ में मंडी शब्द को मण्डप या मण्डपिकाकी छाया में समझा जाना चाहिए। एक समुचा घिरा हुआ, आच्छादित क्षेत्र जहां क्रय-विक्रय की गतिविधियां संचालित होती हों, उसे मंडी कहा जाएगा। मंडी का मौजूदा स्वरूप भी यही होता है। कतार में बने हुए मण्डप या शेड ही इसे मंडी का रूप देते हैं जिसके नीचे दुकानदार सामान बेचते हैं। झोपड़ी या कुटिया के लिए हिन्दी की बोलियों में मढ़ई, मडवई, मढ़ी आदि शब्द हैं। इसका उद्भव भी मण्डप या मण्डपिका; मण्डइआ,मढ़इया,मढ़ई के क्रम में हुआ है। राजस्थानी और मालवी में बहुमंजिला प्रासाद या अट्टालिका के लिए मेड़ी शब्द प्रचलित है। मेड़ी तानना का अर्थ होता है ऊंचे भवन का निर्माण करना यानी भाव खुशहाली के दौर से है।
ण्ड् धातु में घेरा, वलय या गोलाकार का भाव है जिसमें एक सीमांकित क्षेत्र का अभिप्राय है। मण्डल शब्द इससे ही बना है जिसमें राज्य, क्षेत्र, घेरा, वृत्त, गेंद, प्रदेश, राज्य जैसे भाव हैं। प्रशासनिक व्यवस्था के तहत हिन्दी में अंग्रेजी के डिविजन के लिए कई इलाकों में

चलते चलते - हिन्दी में चावल के स्टार्च को माण्ड कहा जाता है। गौर करें यह एक किस्म का फेन होता है जो चावल को उबाले जाने पर ऊपर की ओर उठता है। यहां उभरने के गुण की वजह से ही चावल से निसृत चिपचिपे पदार्थ को मण्डः कहा गया है जिससे हिन्दी में माण्ड या माड़ बना है।

मण्डल शब्द का इस्तेमाल होता है जैसे रेल मण्डल, मण्डल अधीक्षक आदि। अलग अलग विभाग भी अपने प्रशासनिक क्षेत्रों के लिए मण्डल शब्द का प्रयोग करते हैं। परगना, सूबा, जिला, उपनिवेश आदि भी इसी दायरे में आते हैं। मण्ड धातु की रिश्तेदारी इंडो-यूरोपीय धातु men ले भी है जिससे ऊंचाई, उभार, सजाना, आधार प्रदान करना जैसे भाव हैं। गौरतलब है कि अंग्रेजी का mount, mountain जैसे शब्द इसी मूल से बने हैं जिसमें आधार, उभार और ऊंचाई साफ झलक रही है। पर्वत शुरु से ही मनुष्य के आश्रय-आधार रहे हैं। मण्ड धातु में घेरा, घेरना जैसा भाव भी माऊंट में उजागर है। पर्वत एक विशाल क्षेत्र को घेरते हुए सीमांकन का काम करते हैं। हिन्दी में किसी खुले क्षेत्र की उठी हुई सीमारेखा या चहारदीवारी के लिए मेड़ शब्द प्रचलित है जो मण्ड् धातु से ही निकला है। इस धातु से ही बने हैं मण्डलेश्वर, महामण्डलेश्वर, मण्डलाधीश, मण्डलाधिपति जैसे शब्द जिनमें राजा, सम्राट, शासक अथवा धर्मगुरु का भाव है। आजकल मण्डलाधिकारी शब्द चलता है जो आमतौर पर डिस्ट्रक्ट मजिस्ट्रेट यानी कलेक्टर होता है।
ण्ड शब्द में सजावट, शृगार, आभूषित करना जैसे भाव भी हैं। गौर करें सज्जा में ही उभार ही प्रमुख होता है। किसी भी वस्तु, स्थल या देह पर शृंगार का उद्धेश्य उसे दर्शनीय बनाना या उभारना होता है। महिमा-मण्डन में यह स्पष्ट भी हो रहा है जिसका अर्थ है किसी के बारे में बढ़-चढ़ कर बताना। खण्डन-मण्डन में भी यह स्पष्ट है। भूमि पर चित्रांकन की कला को माण्डणा कहते हैं, जो इसी मूल से आ रहा है। माण्डणा भूमि सज्जा की प्रख्यात कला है और लोक-संस्कृति में यह रची बसी है। इसमें विभिन्न बिंदुओं और रेखाओं के माध्यम से एक क्षेत्र को घेरा जाता है फिर सुंदर आकृतियां उभारी जाती हैं। माण्डणा शब्द में मण्ड् धातु में निहित घेराव, उभार और सज्जा के भाव स्पष्ट हैं। किसी वस्तु को चारों ओर से घेरने, कसने या फ्रेम में बांधने के लिए मढ़ना शब्द का प्रयोग होता है जो इसी मूल से आ रहा है। अंग्रेजी के mound शब्द में भी यह भाव स्पष्ट हो रहा है। मण्डन का एक अर्थ वस्त्रधारण करना भी होता है। दोषारोपण के संदर्भ में आरोप मढ़ना मुहावरा भी प्रचलित है। इसमें आरोपों से विभूषित करने या आरोपों के दायरे में कसने जैसे भाव एकदम स्पष्ट हैं।
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Thursday, October 29, 2009

गंज-नामा और गंजहे [आश्रय-16]

04-16-08-xochitiotzin-dental-practice-in-market-blog ज्यादातर बाजार वस्तुओं का भण्डार ही होता है सो गंज की पहचान खजाना और भण्डार के तौर पर सही है।
छो टी बसाहटों के संदर्भ में हिन्दुस्तान में खुर्द, कलां की तरह गंज नामधारी आबादियां भी बहुतायत में मिलती हैं मसलन-गैरतगंज, पटपड़गंज, पहाड़गंज, सादतगंज, हज़रतगंज, नसरुल्लागंज वगैरह वगैरह। किन्हीं शहरों में एक से अधिक गंज भी होते हैं जिनका रुतबा मोहल्ले का होता है और किसी शख्सियत के नाम पर उनका नामकरण किया जाता है जैसे शिवपालगंज। श्रीलाल शुक्ल के मशहूर उपन्यास रागदरबारी के इस गांव के लोगों की पहचान ही गंजहा या गंजहे के तौर पर की जाती है। इस गंज का फैलाव न सिर्फ भारत बल्कि समूचे दक्षिण-पश्चिमी एशिया में देखने को मिलता है। बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अज़रबैजान जैसे सुदूर इलाकों में भी ऐसी अनेक बसाहटें मिलेंगी जिनके साथ गंज शब्द जुड़ा हुआ है। गंज शब्द की आमद हिन्दी में फारसी से बताई जाती है। खासतौर पर बस्तियों के संदर्भ में गंज शब्द का फैलाव मुस्लिम शासनकाल में ज्यादा हुआ होगा क्योंकि ज्यादातर गंज नामधारी बस्तियों के आगे अरबी-फारसी की संज्ञाएं नज़र आती हैं। यूं गंज इंडो-ईरानी मूल का शब्द है और संस्कृत-अवेस्ता में इसकी जड़ें समायी हैं। मूलतः समूहवाची अर्थवत्ता वाले इस शब्द का संस्कृत रूप है गञ्ज जिसका मतलब होता है खान, खदान, घर, निवास, झोपड़ी, कुटिया। समूह के अर्थ में भी इसमें बाजार या मण्डी का भी भाव है। याद रखें कि गंज नामधारी ज्यादातर बस्तियां किसी ज़माने में बड़ा बाजार ही हुआ करती थीं। इसके अलावा गंज का मतलब होता है खजाना, भण्डार, आगार आदि। ज्यादातर बाजार वस्तुओं का भण्डार ही होता है सो गंज की पहचान खजाना और भण्डार के तौर पर सही है।
ञ्ज शब्द की मूल धातु है गंज्। इसमें निहित गन् ध्वनि पर गौर करें। संस्कृत की एक धातु है खन्वर्ग में के बाद आता है । ध्यान रहे कि प्राचीनकाल में मनुष्य या तो कन्दराओं में रहता था या पर्णकुटीरों में। छप्पर से कुटिया बनाने के लिए भूमि में शहतीर गाड़ने पड़ते हैं जिसके लिए ज़मीन को कुरेदना, छेदना पड़ता है। यहा खुदाई का भाव है। खन् में यही खुदाई का भाव प्रमुख है। गञ्ज के खाना, खान या खजाना वाला अर्थ महत्वपूर्ण है। खाना khana शब्द इंडो-ईरानी indian परिवार और इंडो-यूरोपीय परिवार का है जिसमें आवास, निवास, आश्रय का भाव है। संस्कृत की खन् धातु से इसकी रिश्तेदारी है जिसमें खनन का भाव शामिल है। खनन के जरिये ही प्राचीन काल में पहाड़ो में आश्रय के रूप में प्रकोष्ठ बनाए। हिन्दी, उर्दू, तुर्की का खाना इसी से बना है। खाना शब्द का प्रयोग अब कोना, दफ्तर, भवन, प्रकोष्ठ, खेमा आदि कई अर्थों में होता है मगर भाव आश्रय का ही है।
ञ्ज में इसी खन् की ध्वनि झांक रही है। ध्यान रहे कि पृथ्वी को रत्नगर्भा इसीलिए कहा जाता है क्योंकि पृथ्वी नानाविध पदार्थो, वस्तुओं का भण्डार है। मनुष्य के लिए सृष्टि का सबसे बड़ा उपलब्ध खजाना यही है। खजाना हमेशा गुप्त रहता है। इस रूप में खन् , गन् धातु ओं में खुदाई के अर्थ में दरअसल आश्रय, सुरक्षा का भाव प्रमुख है साथ ही पहले से सुरक्षित वस्तु की तलाश भी इसमें शामिल है। इसीलिए खान या खदान जैसे शब्द इससे बने हैं। धातु की खान दरअसल भण्डार ही है। सोने की खान को सोने का खजाना भी कहा जा सकता है। स्पष्ट है कि गञ्ज में शामिल खजाना और निवास का भाव इसके पूर्व रूप खन् में निहित खुदाई के भाव से आ रहा है। गञ्ज का फारसी रूप गंज हुआ। कुछ भाषाविज्ञानी फारसी गंज का मूल तुर्की के गेन से मानते है जिसका अर्थ है विस्तार, फैलाव। यह भी संस्कृत खन् से ही जुड़ती है। कुरेदना, खरोचना, खोदना दरअसल धरती की परत के भीतर फैलाव और विस्तार करना ही है। प्रारम्भिक बस्तियां छप्परोंवाले आवास ही थीं। उसके बाद एक समूचे इलाके को शहतीरों से घेर कर गांव या मण्डल बनाए गए। खानाबदोशों, घूमंतुओं के डेरे ऐसे ही होते हैं। खानाबदोश शब्द भी इसी मूल का है। खाना यानी तम्बू, खेमा। दोश यानी कंधा। आशय उस समुदाय से है जो अपना घर हमेशा कंधों पर लिए घूमता है।
मुस्लिम शासनकाल में देश की कई बस्तियों के साथ खुर्द अर्था छोटी आबादी और कलां यानी बड़ी आबादी जैसे विशेषण जुड़े। मुस्लिम शासनतंत्र की राजस्व व्यवस्था के तहत हुआ। गंज नामधारी बस्तियां भी इसी तरह बसती रही क्योंकि जहां जहां खास किस्म की व्यापारिक गतिविधियां होती थीं, वे स्थान अपने आप मण्डी, बाजार, पत्तन, पाटण आदि का रुतबा पा लेते थे। बाद में सरकारी अधिकारी भी तैनात हो जाता था ताकि करवसूली हो सके। गल्लामण्डी को भी गंज ही कहते हैं। ज्यादातर आबादियां बाजार का विस्तार ही होती हैं। गंज शब्द भी इसका अपवाद नहीं है। इसकी समूहवाची अर्थवत्ता से भी यही साबित होता है। खजाना, कोश, ढेर, अम्बार जैसे अर्थ इससे जुड़े बाजार के भाव को उजागर करते हैं। मुग़लकाल में कई नई आबादियां भी सिर्फ कारोबारी गतिविधियों के लिए बसाई गईं थीं उन्हें भी गंज नाम से जाना जाता था।

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Wednesday, October 28, 2009

हे भीष्म पितामह, हम ब्लॉगर नहीं, पर वहां थे…

 alhbdblog 115 लाहाबाद में हए ब्लागिंग सेमिनार में एक दिवसीय शिरकत के बाद हम दिल्ली चले गए थे। वहां से आज सुबह ही वापसी हुई। इस बीच नेट से दूर रहा। अब रवि जी के सौजन्य से उपलब्ध करीब ढाई दर्जन लिंक्स को बारी-बारी से देखा। ब्लागिंग नहीं करता, ब्लागर नहीं हूं पर इस विधा और इस मंच का उपयोगकर्ता होने की वजह से इस विधा को समझने का उतना ही भ्रम मुझे भी है जितना यहां मौजूद कई लोगों को है ,जिनमें हिन्दुस्तान के अलावा विदेशों में बसे ब्लागिंग के आधा दर्जन से ज्यादा भीष्म पितामह भी हैं। तमाम बातों को दिलचस्पी से पढ़ा। हिन्दी का नाम जिस भी आयोजन से जुड़ा हो, उसे लेकर आरोप-प्रत्यारोप, बहस-मुबाहसा, वितंडा, मान-मनौवल, लगाई-बुझाई न हो, यह असंभव है। इस बार भी यह होना ही था। बहस के किन्हीं आयामों पर बात करना तभी संभव हो सकता है जब उद्धेश्य किसी नतीजे पर पहुंचना हो। सजा या फतवा सुनाने की हिम्मत किए बगैर बहस के नाम पर सिर्फ अतीतगान और पंडिताई हो, तब उबासी आनी स्वाभाविक है।
alhbdblog 063 यह चित्र सुबह साढ़े नौ बजे का है। कार्यक्रम शुरु होने के करीब ढाई घंटे पहले। अनूप नजर आ रहे हैं और पीछे दीवार पर कुछ वायरिंग देख रहे हैं रवि जी। ब्रॉडबैंड के जरिये सबको तुरत-फुरत हाल बताने के प्रयासों में ये दोनों व्यस्त रहे। इनकी लगन को नमन् है। हम भी इनके साथ लगे थे, तमाशाई बन कर। आयोजन के आलोचक ज़रा ध्यान दें, ये दोनों आमंत्रित अतिथि थे।
alhbdblog 008 alhbdblog 011
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जो उबासी इलाहाबाद में नहीं आई, वह इन तमाम लिंक्स को पढ़ते हुए आई। हैरत है कि एक प्रतिष्ठित संस्था द्वारा आयोजित सेमिनार, सम्मेलन, मीट से...जो चाहें कह लें, भाई लोग संतुष्ट नहीं हैं। इसे व्यक्तिगत सम्मान का मुद्दा मानते हुए ब्लागजगत की अस्मिता से बलात्कार जैसी अश्लील शब्दावली का प्रयोग कर रहे हैं। हिन्दी ब्लागिग के पुरोधा वे हैं। या तो इस पर वे कुछ कर सकते हैं, या माइक्रोसॉफ्ट। इनके बीच कोई और नहीं होना चाहिए। निमंत्रण न मिलने की बात कई लोगों ने कही। यह सरासर ग़लत और गलत तथ्य को सही करार देने जैसी बात है। इंडियन एकेडमी के ब्लाग पर बीते महिने के आखिरी हफ्ते में इस बारे में पोस्ट छपी थी जिसका मक़सद ही सबको न्योता देना था। हमने उसे पढ़कर ही सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी से बात की थी और जाने का मन बनाया था। पर दिल्ली का कार्यक्रम तय होने से बाद में न जाने का फैसला किया था। आयोजन के दस दिन पहले फिर मन बदला क्योंकि कई साथियों के आने की सूचना मिली, सो एक दिन का कार्यक्रम बना डाला। इससे दो महिने पहले भी इस कार्यक्रम की सूचना अनूप जी ने दी थी और आने का आग्रह किया था। तब हमने आने-जाने का आरक्षण करा लिया था। हमें नहीं पता कितने लोगों को निमंत्रण मिला, पर हमने पोस्ट पढ़कर आयोजकों से सम्पर्क किया।
हिन्दिनी पर ई-स्वामी की ताजी पोस्ट पर अनूप शुक्ल की टिप्पणी से दो सौ फीसद सहमत हैं। इस संदर्भ में जिस तरह से नामवरसिंह को बुरा-भला कहा जा रहा है वह बेशर्मी की पराकाष्ठा है। आपने क्या ऐसा कर दिया है हिन्दी के लिए जिसकी वजह से नामवरजी से ज्यादा अवदान आपका माना जाए और उनके लिए इस किस्म की अभिव्यक्ति को सही ठहराया जाए? आप साहित्य के क्षेत्र के बहुत बड़े नाम हैं? आपका कोई सफल प्रकाशन है? आप जो ब्लागिंग का तकनीकी ज्ञान देते हैं, नामवरजी ने कभी उसमें ख़लल डाला है? आप लोग जो यह माने बैठे हैं कि आपकी वजह से हिन्दी ब्लागिंग इस मुकाम तक पहुंची है, कृपया इस मुगालते में न रहें। क्या इसे ही हिन्दी सेवा मान रहे हैं ? आप खुद किसी वक्त मठाधीश थे, अब  ब्लागिंग पर बढ़ती हिन्दी देख कर दूसरों को मठाधीश कह रहे हैं। हर एक को किसी मुद्दे पर अपनी राय रखने और उसे बदलने का हक है। आज नामवरजी अगर अपना मत बदल रहे हैं तो उसमें इतना बुरा क्या हो गया? ब्लाग के लिए चिट्ठा शब्द निश्चित ही वर्धा विश्वविद्यालय की देन नहीं है। नामवरजी को इसकी जानकारी नहीं रही होगी। यह कतई महत्वपूर्ण नहीं है कि चिट्ठा शब्द का ब्लाग के लिए सर्वप्रथम प्रयोग करनेवाले का नाम उन्हें पता रहे। यह कोई श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं था। अभी तो इस पर ही हिन्दीवाले एकमत नहीं होंगे कि हर चीज़ के हिन्दीकरण के क्या मायने है? विदेशी प्रतिभा से कोई प्रणाली सामने आ जाए, हम बस इतना कर दें कि उसका हिन्दी नाम रख दें!!! अजीब सिफ़त है हम हिन्दुस्तानियों की!! ब्लाग को ब्लाग ही रहने दो, कोई नाम न दो साथियों.... चिट्ठा शब्द ही ब्लाग का सर्वमान्य पर्याय हो, ऐसा शिवशम्भुजी आकर कह गए थे क्या? सो नामवर जी ने कोई गुनाह नहीं किया है। इसके अलावा उन्होंने या किसी ने भी कोई आपत्तिजनक बात पूरे आयोजन में नहीं कही। हम पूरे अट्ठाइस घंटों के गवाह है।
ब्लाग नाम के चिट्ठारूप की जानकारी तो विभूतिनारायण राय को भी नहीं होगी। हमें अभी तमाम और लोगों को भी इन्हें ब्लाग की विधा से जोड़ना है। यह आयोजन इन्ही की पहल पर हुआ, यह बड़ी बात है। पर कुछ मठाधीश ऐसा नहीं होने देना चाहते। इनके पेट में दर्द होता है जब ये हिन्दी ब्लागरों की बढ़ती संख्या देखते हैं। इन्हें अपना वो छोटा सा कुनबा याद आता है जब अपनी ढपली बजा-बजा कर ये मस्त थे। इनका काम पांच सुरों से ही चल जाता था। सात सुरों की तो बात ही क्या? हिन्दी ब्लागिंग में यह लगातार हो रहा है कि जुमा जुमा पांच, छह साल पहले शुरू हुए संचार-संवाद के इस साधन को चंद तकनीकी जानकारों ने आपसी संवाद का जरिया बनाया। गपशप होने लगी। कुछ लिखते लिखते यह भ्रम भी पाल लिया कि हिन्दी की सेवा हो रही है। अन्य लोग जब इस समूह की गतिविधियों से उत्साहित हुए तब मठाधीशों के अंदाज़ में उनसे पेश आया जाता था। 2005-2006 में मुझे भी यह अनुभव हुआ। अहम्मन्यता का आलम यह था कि ब्लागिंग या अन्य समूहों से जुड़ने की इच्छा रखनेवालों को मठाधीश के अंदाज़ में ज्ञान दिया जाता था और टरकाया तक जाता था। मैं इसका भुक्तभोगी हूं। बाद में जब ब्लागर के आसान तरीके की वजह से 2007 से हिन्दी ब्लागिंग ने तेजी पकड़ी उनमें पत्रकारिता, रंगकर्म और कलाजगत से जुड़े लोग भी थे और सामाजिक कार्यकर्ता भी, तब इनकी धमक से घबराए लोगों ने खुद के लिए पितृपुरुष, भीष्म-पितामह जैसे शब्द गढ़ने शुरु कर दिए। पांच साल की परम्परा के इन भीष्म पितामहों को सोचना चाहिए कि हिन्दी गद्य की शुरुआत कब से हुई, उर्दू (या हिन्दुस्तानी ) का उसमें कितना योगदान था, लल्लूजी लाल कहां टिकते थे। उसके बाद प्रेमचंद हुए। फिर चतुरसेन शास्त्री जैसे लोग भी आए। इनमें से किसी ने भी किसी को भीष्म पितामह नहीं कहा और न ही आलोचकों ने ऐसा कुछ कहा। पर यह उदाहरण करीब डेढ़ सदी का दायरा समेट रहा है जबकि हिन्दी ब्लागिंग एक चुटकुला है। यहां पांच साल में भीष्म पितामह बन रहे हैं और उनकी भूमिका धृतराष्ट्रों जैसी है!!! अपने अलावा कुछ दिखता नहीं है। हर थोड़े समय बाद अतीतगान करते हैं। हमारे वक्त में ऐसा था, वैसा था। राष्ट्रवादी भी थे, , लड़ाके भी थे, सुधारवादी मुसलमान भी थे वगैरह वगैरह। ...ये सब क्या है भाई ?

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चांद पर पहले पहुंचने से क्या चांद पर हक भी अमेरिका का हो गया? वो तय करेगा कि क्या, कैसे होना चाहिए? एक आयोजन नहीं झेला जा रहा है। खींच खींच कर पोस्ट लिखने के बहाने ढूंढे जा रहे हैं। इससे पहले के जिन आयोजनों की जानकारी सार्वजनिक कर दी गई थी, उनमें स्थानीय ब्लागरों के अलावा कितने स्वनामधन्य ब्लागर चले जाते रहे हैं ? यह सर्टिफिकेट कौन देगा कि इन्द्रसभा का न्योता भी आपको मिल जाए तो उसमें आप कमी नहीं निकालिएगा?
हिन्दी ब्लागिंग के पहले दशक में ही भीष्म पितामह से लेकर भस्मासुर तक सब पैदा हो गए? सचमुच पुराण कल्पित कलियुग आया हो या नहीं, पर हिन्दी ब्लागिंग में तो यह यकीनन आ चुका है। एक अच्छे आयोजन की बेबात, घर बैठे  इतनी आलोचना सचमुच हिन्दी में ही सम्भव है। हमें खुशी है कि हम एक दिन के लिए ही सही, एक बेहतरीन आयोजन के साक्षी बने। हिन्दुस्तानी एकेडमी, महात्मागांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा को इस आयोजन के लिए बधाई देते हैं। सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी और डॉ संतोष भदौरिया ने समूचे आयोजन को गरिमामय रूप देने में बहुत मेहनत की है। अनूपजी सकारात्मक सोच वाले ब्लागर साथियो से सम्पर्क करने में जुटे रहे। आयोजकों की इच्छा शक्ति का सम्मान रखते हुए, मगर इस विधा में उनकी नई अभिरुचि के मद्देनजर अनूप जी ने व्यस्तता के बावजूद समय निकाला। इलाहाबाद से दूर-पास के जो भी ब्लागर साथी आयोजन में पहुंचे, वे सिर्फ हिन्दी ब्लागिंग पर चर्चा और उससे बढ़ कर ब्लागरों के आपसी मेल-जोल के इस अवसर का लाभ लेने पहुंचे थे। आभासी रिश्तों की जब कभी यथार्थ के धरातल पर आजमाईश का मौका हो, आज के युग में उसे गंवाना नहीं चाहिए। यह अवसर तकनीक और तहजीब की परख का होता है। हम सब जो वहां थे, इसी बात के लिए थे। न हमें भ्रष्टाचार की बू आई, न कोई सड़ांध, न ही किसी वाद का वितंडा। हमें नहीं लगता कि वहां से हम कुछ खोकर लौटे हैं या ठगे गए हैं। हमारी उपलब्धि है कि हम कई दोस्तों से बतियाए। हर्षवर्धन त्रिपाठी, भूपेन, इरफान, मसिजीवी का वक्तारूप बहुत अच्छा लगा। हे मठाधीशों, पितृपुरुषों, भीष्म पितामहों, आप भी आते तो अच्छा लगता। अपना बड़प्पन दिखाते हुए। आपके दो पथभ्रष्ठ साथी यहां थे, पर उन्हें इन विशेषणों से मोह नहीं और न ही वे ऐसा कुछ होने का ढोंग करते हैं। उन्हें पता है पांच साल और पचास साल का फर्क क्या होता है। प्रेमचंद की बड़ै भैया कहानी भी उन्होंने पढ़ी है, शायद आपने नहीं।
रोषपूर्ण टिप्पणियों की प्रतीक्षा में….एक अ-ब्लागर जो1983 से पत्रकारिता कर रहा है और 1989 से ऑनलाईन पत्रकार-कर्म करने का आदी रहा है, फिर भी खुद को तकनीकी निरक्षर ही मानता है। बीते कुछ वर्षों से एमएस वर्ड में लिखने की जगह ब्लागर के एडिट आप्शन में जाकर लिख रहा है। वजह जानने के लिए फोन करें, हिन्दी में समझा दूंगा।  मैं भी एक साथ कनपुरिया, मालवी, महाराष्ट्रीय, भोपाली और हरियाणवी हूं साहबान। समझ रहे हैं न!!!  ये  अति होने के बाद की बातें हैं। देखते हैं, आप कैसी बाते करते हैं। वैसे मुझे अपने देश की संस्कृति और मिट्टी की खूब पहचान है… आप लोग कुछ विदेश में घूम-घाम कर भूल कर रहे हैं। आप मठाधीश हैं, अपन भी खांटी पत्रकार हैं। बताएँ, नामवरसिंह को क्यों इतनी गाली दी जा रही है। हमने क्या गुनाह किया वहां जाकर। आप कौन हैं साहब। बहुत छिपाया नाम, अब तो बताएं? जै जै।

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Wednesday, October 21, 2009

लाईन, लिनेन, लिनोलियम [लकीर-6]

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संबंधित कड़ियां-1.लीक छोड़ तीनौं चलै, सायर-सिंघ-सपूत [लकीर-1]2.रेखा का लेखा-जोखा (लकीर-2)3.कोलतार पर ऊंटों की क़तार [लकीर-3]4.मेहरौली, मुंगावली, दानाओली, दीपावली[लकीर-4]5.सूत्रपात, रेशम और धागा [रेखा-5]
क़तार के अर्थ में लाईन line शब्द अंग्रेजी का है मगर हिन्दी ने इसे अपना लिया है। लाईन शब्द की अर्थवत्ता बहुआयामी है। लकीर और क़तार शब्दों में मूलतः सरल रैखीय भाव तो है पर ये एक दूसरे के वैकल्पिक शब्द नहीं है। रेखा खींची जाती है जबकि कतार बनती है या लगती है। रेखा के अर्थ में कतार खींचना जैसा वाक्य प्रयोग नहीं किया जा सकता। मगर लाईन शब्द में चमत्कारिक अर्थवत्ता है। हिन्दी में कतार के अर्थ में भी लाईन है, सरल रेखा के अर्थ में भी लाईन है और सरणि अर्थात पंक्ति के अर्थ में भी लाईन है। लाईन खींची भी जाती है, लाईन लगाई भी जाती है, लाईन तोड़ी भी जाती है और लाईन तोड़ने वाले को लाईन हाजिर भी कर दिया जाता है जिसका मतलब है अनुशासनहीनता दिखाने पर सजा देना। इसी तरह लाईन में लगना एक तरह से नियम-पालना, दण्ड या अनुशासन का द्योतक है। लाईन तोड़ने में अनुशासनहीनता साफ झलक रही है। हिन्दी में लाईन मारना मुहावरा भी बीते कुछ दशकों से चल पड़ा है जिसका अभिप्राय किसी को ( प्रेमिका के संदर्भ में ) प्रभावित करने के उपक्रम से है।
लाईन शब्द इंडो – यूरोपीय भाषा परिवार का है जिसका अर्थ वही है जो हिन्दी के सूत्र और फारसी के रिश्ता यानी सेवईं का है। सूत्र का अर्थ धागा होता है। इसी तरह लाईन की अर्थवत्ता व्यापक है और इसमें रस्सी, धागा, रास्ता, कतार, आदि भाव है। लाईन लैटिन मूल का शब्द है जिसका रिश्ता एक खास किस्म के कपड़े से है जिसे लिनेन कहा जाता है। लैटिन में इसका रूप है linum जिसका मतलब है एक खास किस्म की वनस्पति जिससे निर्मित रेशे से सूती वस्त्र का निर्माण होता है जिसे लिनेन कहा जाता है। भारत में इस पौधे के कई नाम हैं मगर ज्यादातर इसे अलसी के नाम से जाना जाता है। इसके बीजों से तेल निकाला जाता है जो प्रसाधन उद्योग में काम आता है। इसकी एक नस्ल जूट भी है।
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एक खास किस्म की फर्शीचटाई को लिनोलियम कहा जाता है जिस पर कोई दाग-धब्बा नहीं लगता। इसका निर्माण भी जूट यानी लीनम के रेशों से होता है।linoleum
अलसी का एक नाम पटसन भी है। भारत में अलसी का पौधा दरअसल ओषधीय और बहुउपयोगी पौधा माना जाता है। जहां तक लीनम की बात है इससे बने लिनेन का अर्थ सूती कपड़ा होता है। समूचे यूरोप में यह पौधा बेहतरीन, शरीर के अनुकूल और हर मौसम में धारण करने लायक समझा जाता रहा है।
संस्कृत में जूट या अलसी के कई नाम है जैसे उमा, मालिका, क्षमा, पार्वती, सन, सुनीला और बदरीपत्री आदि। इसी तरह गोथिक, लैटिन और ग्रीक मूल की विभिन्न भाषाओं में इस मूल के कई शब्द है जैसे lin, llion, liner, linum, linen, lein, lan आदि। भारतीय जूट या पटसन की तरह ही इंडो-यूरोपीय भाषाओं वर्णों में परिवर्तन होता है। भारतीय भाषाओं में लकीर, लेखा, लिख, लीक, ऋष् ,रास्ता, रेशा, रेशम, रिश्ता जैसे ज्यादातर शब्द कतार, पंक्ति, रेखा, मार्ग या तन्तु की अर्थवत्ता रखते हैं। इनके मूल में वर्ण में समाई ध्वनि है जिसमें अधिकार, क्रमबद्धता, जाना, गमन करने से लेकर निर्दिष्ट करने, राह दिखाने जैसी अर्थवत्ता है। रेखाएं गुज़रती ही हैं और ये हमें मार्ग भी दिखाती है। लाईन शब्द में लिनेन यानी एक विशिष्ट पौधे से लेकर उससे निर्मित फाईबर या तन्तु से बने वस्त्र तक का भाव इसकी इंडो-यूरोपीय ध्वनि से रिश्तेदारी स्थापित करता है। यूरोप में भी लीनम यानी अलसी के पौधे से उत्तम किस्म के रेशे तैयार किए जाते हैं। एथेंस के पास ए प्राचीन स्थल है माईसेने। प्राचीनकाल में यहां एक समृद्ध संस्कृति पनपी थी। पुरा ग्रीक काल की एक भाषा का नाम इसी क्षेत्र के नाम पर माइसेनियन है जिसमें लीनम का एक रूप री-नो ri-no भी है। यह माना जा सकता है यह ध्वनि बाद में में परिवर्तित हुई। बहरहाल ऋष् धातु से बनी रेखा का संबंध इसी मूल से बने फारसी शब्द रिश्ता, रिश्तः (सिंवई, सूत्र), रास्ता से भी है। इसी तरह रेशम यानी सूत्र भी इसी कड़ी का हिस्सा है। जब बात लिनेन जैसे कपड़े तक पहुंचती है तब भी यही ऋष् इसमें नजर आता है।
साफ है कि प्राचीन यूरोप में भी लिनेन यानी सूत का उपयोग वस्त्र निर्माण के साथ पैमाइश के लिए भी होता था। लिनेन का रेशा सरलता और सीध का प्रतीक था जिसमें सरणि, राह, क्रम, कतार का भाव उभरता था। अभिप्राय मनुष्यों अथवा वस्तुओं के क्रमबद्ध विन्यास से ही था। लाईन, लीनियर, लाईनेज, लेन, लाइंस (सिविल) जैसे शब्द इसी मूल से उपजे हैं। एक खास किस्म की फर्शीचटाई को लिनोलियम कहा जाता है जिस पर कोई दाग-धब्बा नहीं लगता। यह सामान्य पत्थर के फर्श की तुलना में चिकनी, हल्की और चमकदार होती है क्योंकि इसका निर्माण भी जूट यानी लीनम के रेशों से होता है। इसकी मोटाई और कठोरता राज़ इसमें छुपे तेल से रिस कर बाहर आ रहा है। लिनोलियम बना है लीनम+ओलियम (linum+oleum= linoleum) से। लैटिन में ओलियम का मतलब होता है तेल, तैलीय। अंग्रेजी का ऑईल शब्द इससे ही बना है। पेट्रा यानि मिट्टी, प्रस्तर आदि और ओलियम यानी तेल, इससे बने पेट्रोलियम शब्द से भी यह जाहिर है। गौर करें कि जिस तरह हमारे यहां अलसी के बीज तेल निकालने के काम आते है वैसे ही यूरोप में भी लाईनसीड linseed का उपयोग होता है। लिनोलियम में इस वनस्पति से निर्मित दोनों प्रमुख उत्पादों रेशा और तेल का उपयोग हो रहा है। तेल की गाढ़ी पर्त के साथ विभिन्न मोटाई वाले रेशों के सघन विन्यास से ही लिनोलियम बनता है जिससे टिकाऊ और खूबसूरत चटाई या मैट्रेस का निर्माण होता है।

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